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पत्रकारों पर हमलों को दोषियों को नहीं मिलती सजा, जानिए! क्या कहते हैं आंकड़े

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शाहनवाज़ हसन, रांची: 
पत्रकारों के विरुद्ध अपराधों के मामलों में दण्ड निडरता की दर में मामूली गिरावट तो आई है लेकिन अब भी विश्व भर में ऐसे 87 फ़ीसदी मामले अनसुलझे हैं जबकि 99.9 प्रतिशत मामलों में पत्रकारों पर हमलों के आरोपियों को न्यायालय से ज़मानत मिली है।

प्रेस स्वतन्त्रता की रक्षा में को लेकर रिपोर्ट बनाने वाली यूएन एजेंसी संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) की  रिपोर्ट में यह बात सामने आई है। यूनेस्को की महानिदेशक ऑड्री अज़ूले ने पत्रकारों की सुरक्षा और दण्डमुक्ति के ख़तरे के मुद्दे पर रिपोर्ट जारी की है । ‘Safety of Journalists and the Danger of Impunity’. नाम से जारी रिपोर्ट में कई बातें सामने आई है। 

रिपोर्ट यह दर्शाती है कि दुनिया भर में पत्रकारों के ख़िलाफ़ अपराधों के मामलों में महज़ 13 फ़ीसदी मामले ही सुलझ पाए हैं जबकि, भारत में यह आंकड़ा एक फ़ीसदी से भी कम है। भारत में पिछले 20 वर्षों में पत्रकारों की जितनी हत्याएं हुई हैं उनमें से मात्र 2 मामलों में ही आरोपियों के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय ने ज़मानत देने से इंकार किया है। हर दो वर्षों में जारी की जाने वाली यह रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2018-19 में विश्व भर में में पत्रकारों की हत्या के 156 मामले दर्ज किये गए थे। रिपोर्ट के अनुसार पिछले एक दशक में हर चार दिन में एक पत्रकार की मौत हुई है।

वर्ष 2018 में 99 मौतें दर्ज की गई थीं जबकि 2019 में 57 पत्रकारों के मारे जाने के मामले सामने आए, जोकि पिछले दस वर्षों में सबसे कम आँकड़ा था। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि सितम्बर 2020 तक 39 पत्रकार अपनी जान गंवा चुके हैं।

पत्रकारों के लिए गठित यूएन एजेंसी के अनुसार पत्रकारिता अब भी सबसे ख़तरनाक पेशा बना हुआ है। पत्रकारों के सामने ख़तरे अनेक हैं और व्यापक सत्र पर हैं। हिंसक संघर्षों से गुज़र रहे देशों के संबंध में हताहतों में गिरावट आई है। भ्रष्टाचार, मानवाधिकार उल्लंघन, पर्यावरणीय अपराध, तस्करी और राजनैतिक घपलों के मामलों पर रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों पर जानलेवा हमले अन्य देशों के साथ भारत में अधिक बढ़े हैं। राजनीतिक प्रतिबद्धता के कारण पत्रकारों के विरुद्ध सबसे अधिक झूठे मुकदमे भारत में दर्ज किए गए हैं।

ये रिपोर्ट हर दूसरे वर्ष यूनेस्को में संचार विकास के लिये अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रम की अन्तर-सरकारी परिषद को सौंपी जाती है। यूनेस्को के सदस्य देशों के लिये यह वैश्विक घटनाक्रम का जायज़ा लेने और पत्रकारों की सुरक्षा को बढ़ावा देने व दण्डमुक्ति के ख़िलाफ़ लड़ाई में चुनौतियों पर चर्चा करने का एक अवसर है।

भारतीय प्रेस परिषद ( प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया) का गठन प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा करने व उसे बनाए रखने, जन अभिरूचि का उच्च मानक सुनिश्चित करने से और नागरिकों के अघिकारों व दायित्वों के प्रति उचित भावना उत्पन्न करने का दायित्व के लिए किया गया था। यह एक संविघिक स्वायत्तशासी संगठन है।

पत्रकारिता की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए बनी संस्था प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की अब तक की कार्यशैली यही रही है कि वे पत्रकारों की हत्या के बाद किसी भी पत्रकार को न्याय दिलाने के स्थान पर सरकार के साथ मज़बूती से खड़ी रही है। पिछले दिनों कश्मीर टाइम्स की एग्जीक्यूटिव एडिटर अनुराधा भसीन ने पत्रकारों की स्वतंत्रता के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। इस पर प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन न्यायमूर्ति चंद्रमौली प्रसाद ने भसीन द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में हस्तक्षेप करते हुए पत्रकार के पक्ष का समर्थन करने की जगह सरकार के कदमों का समर्थन किया था। 

प्रेस कॉउंसिल ऑफ इंडिया में सदस्यों की नियुक्ति की प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में अक्सर रही है। नियुक्ति को लेकर पत्रकार संगठनों के पदाधिकारियों पर पैसों के लेनदेन की खबरें सोशल मीडिया में वायरल होती रही हैं। पत्रकार हितों की रक्षा के लिए कार्यरत पत्रकार संगठन भारती श्रमजीवी पत्रकार संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अशोक पांडेय का कहना है कि पत्रकारों की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए यदि प्रेस कॉउंसिल ऑफ इंडिया कार्य कर रही होती तो पत्रकारों की हत्याएं, उन पर हुए हमले और झूठे मुकदमों में जिन पत्रकारों को जेल भेजा गया है उन्हें न्याय मिल गया होता। उन्होंने कहा कि उन्हें याद नहीं पड़ता कभी किसी लापरवाह पुलिस अधिकारी के विरुद्ध प्रेस कॉउंसिल ऑफ इंडिया ने कार्रवाई के लिए पिछले एक दशक में अनुशंसा की और उस अधिकारी के विरुद्ध कार्रवाई की गयी हो।

प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक एवं डिजिटल मीडिया की रक्षा के लिए कार्यरत पत्रकार संगठन बीएसपीएस के राष्ट्रीय प्रवक्ता पवन कृपा शंकर भार्गव कहते हैं कि पत्रकारों पर बढ़ते हमले अधिकांश रेत माफिया, मनरेगा के मामलों को उजागर करने और राजनीतिक प्रतिबद्धता के कारण हुए हैं। भार्गव का कहना है उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखण्ड और छतीसगढ़ जैसे राज्यों में पत्रकारों के ऊपर हुए हमलों के सही आंकड़े तक प्रेस कॉउंसिल ऑफ इंडिया के पास मौजूद नहीं हैं। जिन पत्रकार संगठनों के सदस्यों को प्रेस कॉउंसिल ऑफ इंडिया के सदस्य के रूप में मनोनीत किया जाता रहा है उनमें से अधिकांश केवल सरकारी मेहमान नवाजी के मज़े लूटते रहे हैं उन्हें पत्रकारों की पीड़ा से कोई सरोकार नहीं रहा है।

राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार एस एन गौतम कहते हैं कि सबसे बड़ी विडंबना यही रही है कि पत्रकारों की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए बनी प्रेस कॉउंसिल ऑफ इंडिया के सदस्यों की नियुक्ति की पूरी प्रक्रिया मनमाने ढंग से मनोनीत कर की जाती है। मनोनीत होने वाले अधिकांश सदस्य सुविधाभोगी होते हैं उन्हें पत्रकारों की समस्याओं से कोई सरोकार नहीं होता। ऐसे में पीड़ित पत्रकारों को न्याय मिलने की उम्मीद प्रेस कॉउंसि ऑफ इंडिया से करना ही पूरी तरह से बेमतलब सा लगता है।

( लेखक भारती श्रमजीवी पत्रकार संघ के राष्ट्रीय महासचिव हैं)


नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं। द फॉलोअप का सहमत होना जरूरी नहीं। हम असहमति के साहस और सहमति के विवेक का भी सम्मान करते हैं।