कर्मेंदु शिशिर, पटना:
सवाल हिन्दू, मुस्लिम का नहीं है। सवाल कट्टरता और सहिष्णुता का है। सारे हिन्दू कट्टर हैं या सारे उदार यह एक सिरे से बेवकूफी भरी सोच है। उसी तरह सारे मुसलमान कट्टर हैं या सहिष्णु, यह वैसी ही बेवकूफी है। धर्म अपने तात्विक शक्ल में कट्टर होता ही है क्योंकि वह अपरिवर्तनशील होता है। उसमें जोड़ घटाव की गुंजाइश नहीं होती।जरूरत पड़ने पर थोड़ा बहुत बदलाव का स्पेस उसके कस्टोडियन धार्मिक रखवाले अपने हित में निकाल लेते हैं। मगर आम जनता के लिए वह यथावत अपरिवर्तनशील ही होता है। जब वह संस्थागत शक्ल ले लेता है।पुष्ट पूँजी से सबल हो जाता है, सत्ता या राजनीति से जुड़ जाता है तो उसके जलवे के सामने सारे विचार बौने हो जाते हैं। फिर वह धर्म, वह धर्म नहीं रह जाता जिसके लिए उसे लाया या बनाया गया था। उसकी व्याख्याएं बदल जाती हैं। हर धर्म की रूह उसकी रूहानियत और तसव्वुर में है। वह गौण हो जाती है। तब " मन न रंगाये, रंगाये योगी कपड़ा, दाढ़ी बढ़ाकर बन गये बकरा " की शक्ल वाले उसके प्रवक्ता बन जाते हैं। कंद मूल खाकर वनों में तपस्या करने वालों की जगह सोने की पोशाक, अफरात संपत्ति और अतुलित ताकत के साथ जब ये सामने आते हैं तो तख्तोताज सिर नवा कर पाँव सहलाते हैं। ये वाटरप्रूफ की तरह बुद्धिप्रूफ होते हैं। इन पर किसी तर्क, अक्ल,बुद्धि का असर नहीं। आजकल इन्हीं का बोलबाला है। पाकिस्तान के बड़े सहाफी हसन निसार का गुस्सा सुनते बनता है। कहते हैं ये दवा और दूध में मिलावट करने वाले ,लोभ में किसी का गला काटने वाले हत्यारे, कम तौल वाले बेईमान इस्लाम की बात करते हैं? तो आप हिन्दू हो या मुसलमान ; भारत में हों या भारतीय उपमहाद्वीप में। आप सच्चे हिन्दू या मुसलमान अथवा मानवतावादी हैं तो अल्पसंख्यक हैं। सम्भल जाइये। जान बचाकर रहिये।वरना राजेश जोशी की कविता है न--मारे जाओगे। और कोरोना काल में कन्डोलेंस भी नहीं होगा।
जाति से हटकर कहना भी जुर्म आजकल
जब हम जाति को लेकर कुछ लीक से हटकर कहते हैं तो लोगों को अच्छा नहीं लगता अथवा वे चुप्पी साधना पसंद करते हैं। लेकिन आप गौर कीजिए कि इस देश में गांधी, नेहरू, अंबेडकर या लोहिया के रास्ते पर कौन चलता है? बात वही कीजिए जो चल रहा है। मैं कहना यह चाहता हूँ कि पिछड़े और दलित शब्द का प्रयोग अब भ्रामक है।पिछड़े और दलित दोनों में शामिल अनेक जातियाँ हैं।इसमें जो संख्या में अधिक हैं, आर्थिक रूप से और ताकत के स्तर पर सबल हैं। पिछड़ा और दलित कहने से वे प्रतिबिम्बित नहीं हो रहे हैं। इसका दुष्परिणाम यह हो रहा है कि ताकत और पैसे के बल पर सबल हुई जातियाँ जो कमजोर जातियों को दमित करती हैं, दबाती हैं।ऐसी जातियों की संख्या पहले से बढ़ी है। ऐसे में नीचे से, कम संख्या वाली, आर्थिक स्थिति से कमजोर जातियों को शिक्षा और रोजगार में प्राथमिकता देकर ऊपर लाने वाली कोशिशे होनी चाहिए और ऐसी नीतियाँ बननी चाहिए। बहुमत की नृशंसता कायम कर विचारों का दरेरा देने वालों की बातें मेरे भेजे में नहीं घुसती। इसीलिए इन जातियों को विचार वगैरह का प्रपंच छोड़ कर अपनी अपनी जाति को संगठित करना चाहिए। तब वे सवर्ण, पिछड़ा या दलित के समर्थ नेताओं या दलों से बारगेन कर पायेंगे।राजभर, निषाद,पटेल जैसी जातियों के बारगेन को मैं इसी की शुरुआत के रूप में देखता हूँ।जब आप अंबेडकर या लोहिया के रास्ते पर नहीं चलकर जाति वर्चस्व की राजनीति कर रहे हैं तो इसके अलावे और रास्ता ही क्या है?
आँख बंदकर किसी का समर्थन और विरोध करने से बचना
जिस तरह आँख बंदकर किसी का समर्थन करने से बचना चाहिए उसी तरह आँख बंदकर विरोध करने से भी।ख़ासकर युवा बुद्धिजीवियों को इस स्तर पर बहुत सचेत रहने की जरूरत है। यह तो सही है कि हमेशा अपने नजरिये को आलोचनात्मक बनाये रखने से बौद्धिक विकास में मदद मिलती है। इसके लिए निरंतर अध्ययन, सोच और चिंतन मनन की जरूरत होती है। एक सचेत वैज्ञानिक की तरह असहमति, आलोचना, विरोध और आक्रमण के बारीक फ़र्क को समझना बहुत जरूरी होता है। पूरे नकार और पूरे स्वीकार की पद्धति से भरसक परहेज़ करना चाहिए।तथ्य, तर्क और विचार के साथ आपकी मंशा भी असंदिग्ध और निर्दोष होनी चाहिए।तभी आपका विश्लेषण भी सही हो सकता है। इसीलिए बौद्धिक दुनिया में सहिष्णुता और लोकतांत्रिकता को बहुत अहमियत दी जाती है। यह सब एकाएक नहीं हो पाता, इसके लिए निरंतर अभ्यास जरूरी होता है।हमको पता नहीं चलता लेकिन हमारे अंदरूनी हठ अजाने हमारी सोच को प्रभावित करते हैं और हम तथ्य, तर्क और विचार के साथ अपने विश्लेषण को इच्छित मोड़ दे देते हैं। यह सब कहना हमारे या किसी के लिए आसान होता है लेकिन सचमुच इसको विन्यस्त करना बहुत ही कठिन।लेकिन इसकी एक निरंतर कोशिश तो जरूर करनी चाहिए। जो हम कर सकते हैं। कम से कम साहित्य और विचार की दुनिया में यह बहुत जरूरी होता है। इसीलिए अपने भीतर संग्रह और त्याग का विवेक पैदा करना बहुत ही जरूरी हो जाता है।यह देखकर बहुत आश्चर्य होता है कि हम हमेशा आर-पार की मुद्रा में होते हैं।यह पद्धति दुनिया का कोई बड़ा विचारक नहीं अपनाता।

(कर्मेंदु शिशिर हिंदी के वरिष्ठ लेखक हैं। कई किताबें प्रकाशित और प्रशंसित।)
नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं। द फॉलोअप का सहमत होना जरूरी नहीं। हम असहमति के साहस और सहमति के विवेक का भी सम्मान करते हैं।