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महिला दिवस: उस लेख को पढ़िये जिसे अखबार-पत्रिका ने छापने से मना कर दिया था

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सुजाता लिखती हैं कि इस लेख को राजस्थान पत्रिका की सम्पादकीय टीम ने छापने सेे मना कर दिया था। आप भी पढ़िए और देखिए कि आधी आबादी की बात को जगह देने का दावा करने वाले कितने दिलेर हैं कि वे इस लेख को नहीं छाप पाए। 
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औरतों के लिए नियमावली की किताब हमलावरों के लिए निर्देशिका है
- सुजाता
 
कहा जाता है औरतें कानूनों का फायदा उठाती हैं। ग़ौर से देखिए तो बात उलटी है। औरतें कानूनों का फायदा ही नहीं उठाती हैं। बलात्कार तो जाने दीजिए, स्त्री की गरिमा को ठेस पहुँचाने, यौन हिंसा करने के इतने मामले होते हैं कि एक औरत सब पर प्रतिक्रिया करने लगे, रपट दर्ज कराए, तो उसकी ज़िंदगी का आधा हिस्सा इसमें चला जाए।

भारतीय दण्ड संहिता की धारा 354 के तहत किसी महिला की गरिमा को ठेस पहुँचाना अपराध है। जिसके लिए एक से पाँच साल तक की सज़ा तय है। महिला की गरिमा होती क्या है? सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्त्री की गरिमा उसकी लैंगिक अस्मिता, उसके सेक्स में निहित होती है। इस धारा के तहत तमाम बहसों में यह निकल कर आया कि स्त्री की गरिमा को ठेस पहुँचाने में अपराधी का इरादा और सोच मानी रखती है यानी वह जानता है कि एक महिला की गरिमा क्या है और वह उसे जानते-बूझते ठेस पहुँचा रहा है। घर पर रहने वाली, बाहर जाने वाली स्त्रियाँ बता सकतीं हैं कि कितने अनचाहे स्पर्श और अवांछनीय व्यवहार ऐसे थे जो सचेत रूप से किए गए या कितने ऐसे थे जो बिना मंशा के हो गए।

लेकिन महिला की गरिमा क्या होगी, यह उसकी प्रतिक्रिया तय नहीं करती बल्कि समाज-कानून-स्वीकृत मापदंड करते हैं और समाज तो पितृसत्तात्मक है। जिसमें शील, मॉडेस्टी या गरिमा नियंत्रण के औजार हैं। जब समाज ने औरतों के लिए सलीके की किताब लिखी तो उसे हमलावर को भी पकड़ा दिया; एक ऐसी हैंडबुक की तरह जिसके इस्तेमाल से वह स्त्री के साथ अपना पॉवर-इक्वेशन स्थापित करता रहा. उसे पता था कहाँ चोट करने से क्या होगा. उसे पता था कि स्त्री को कैसे अपमानित और प्रताड़ित किया जा सकता है और इल्ज़ाम से बचा भी जा सकता है। दुनिया भी तो महिला की गरिमा की बात कहती रहती है- देर तक बाहर थी, कम कपड़े थे, अकेली क्यों थी, शराब क्यों पी थी, हँसी क्यों, चली क्यों! हमलावरों को यही सहारा है।

पिछले दिनों मुम्बई हाईकोर्ट ने बाल यौन शोषण कानून (POCSO)के तहत, बारह साल की बच्ची को मोलेस्ट करने वाले अपराधी को बचाने के लिए, इसे महिला की गरिमा को ठेस का मामला बना दिया। इससे सज़ा तो साल भर की हो जाती लेकिन अगर बारह साल की बच्ची को महिला की तरह देखा गया तो बारह साल के लड़के के यौन शोषण के लिए वही अदालत क्या पैमाना अपनाती? कानूनों की पितृसत्तात्मक व्याख्याएँ सच्चा न्याय कर सकेंगी?



(चोखेरबाली हिंदी के पहले सामुदायिक स्त्रीवादी ब्लॉग का आगाज सुजाता ने ही किया था। कविता संकलन अनन्तिम मौन के बीच, उपन्यास एक बटा दो और स्त्री निर्मिति (विमर्श) किताब प्रकाशित। संप्रति दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक कॉलेज में प्राध्यापक।)

नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं। द फॉलोअप का सहमत होना जरूरी नहीं। सहमति के विवेक के साथ असहमति के साहस का भी हम सम्मान करते हैं।