कायनात क़ाज़ी, दिल्ली:
वो मेरी शायद दूसरी ट्रिप थी कश्मीर की। इसलिए इस जगह से शनासाई थोड़ी सी हो चली थी। इस बार मेरे साथ मेरे भाई भाभी और छोटू भी आए थे। इसलिए हमें वो सब तो करना ही था जो कि टूरिस्ट किया करते हैं लेकिन इस सब के बीच वो भी करना था जो सिर्फ मुझ जैसे पागल लोग करते हैं। यहाँ एक टिप देती हूँ। फोटोग्राफी के शौक़ीन लोगों के लिए। अगर आप शुरुआत कर रहे हैं, तो गूगल इमेज से दोस्ती कर लीजिए और अपने सीनियर फोटोग्राफरों के काम को स्टडी किया कीजिए। आपको तस्वीरों की बेहतर समझ विकसित होगी और जिस जगह पर जा रहे हैं वहां की कुछ बेहतरीन तस्वीरों के लिए आईडिया भी मिलेगा।
डल से शुरू होकर नेहरु पार्क और गोल्डन लेक तक
इस बार मेरी हिट लिस्ट में थी डल लेक के भीतर की वो दुनिया, जो टूरिस्टों की पहुँच से दूर थी। वहां केवल हम जैसे ही पहुँचते थे। डल लेक का जो टूरिस्टी आकर्षण है वो तो डल लेक से शुरू होकर नेहरु पार्क और गोल्डन लेक तक ख़त्म हो जाता है। लेकिन इस के परे एक दुनिया है जो की कश्मीर के लोगों की असली ज़िन्दगी को बयां करती है। एक दुनियां जो पानी के ऊपर बसी है, जहाँ घर हैं, फ्लोटिंग खेत हैं, दुकाने हैं, मस्जिद है, बेकरी है। और सुबह सुबह लगने वाला सब्जी का फ्लोटिंग बाज़ार है। जब आम टूरिस्ट अपने होटलों में पहली चाय की चुस्की ले रहा होता है और सोच रहा होता है कि आज कहाँ जाएँ उस वक़्त तक ये डल के भीतर के किसान अपनी अपनी पतली नावों में सब्जियां बेच कर, गप्पें लड़ा कर, हुक्का गुड गुड कर अपने अपने घरों की ओर हो लेते हैं।
एक रात पहले एक शिकारा वाले से बात
लेकिन इसे देखने के लिए आपको प्लान करना पड़ेगा। मैनें डल लेक पर चेट्टी नम्बर 4 पर एक रात पहले एक शिकारा वाले को नक्की किया। उसने सुबह चार बजे आने 4 का कहा। अगली सुबह मैं चार बजे से पहले उठ कर तैयार हुई और नीचे पहुंची। रिसेप्शन खाली था और होटल का दरवाज़ा अन्दर से बंद। अब क्या करूँ ? घड़ी पर नज़र डाली। चार बजने वाले हैं। इधर उधर देखा। सामने बड़ी सी खिड़की नज़र आई। शुक्र है खुलने वाली थी. और शुक्र इस बात का भी है कि उस समय मैं आज जितनी भरी नहीं थी। इसलिए पतली सी खिड़की से फंस-फंसा कर किसी तरह बाहर निकली। जल्दी-जल्दी मेन गेट पर पहुंची। अब यहाँ भी गेट बंद. उफ्फ क्या मुसीबत है ? आज क्या ऊँची कूद की प्रतियोगिता हो रही है ? मेरे सामने सड़क के उस पार चेट्टी नंबर 4 पर मेरा शिकारा वाला हाथ हिला रहा था। हमारे बीच एक सड़क और एक गेट का फासला था।
जल्दी करो। उसने हाथ से इशारा किया। गेट पर ताला और चौकीदार गायब. अब किसे कहाँ ढूंडू. वक़्त निकला जा रहा है। अब ? अब क्या?
पानी को छू कर आती सर्द हवाएं
मैंने शिकारा वाले को पास बुलाया। उसे अपना कैमरा थमाया और जय बजरंग बलि कर गेट पर चढ़ी। पांच फीट के गेट को पर करने का ये मेरा पहला अनुभव था। चढ़ तो गई अब दूसरी ओर कूदूं कैसे ? अल्लाह का नाम लिया और हिम्मत करके कूद गई। जल्दी-जल्दी शिकारा में बैठी और हम डल के भीतर की ओर बढ़ने लगे। पानी को छू कर आती सर्द हवाएं हाड़ कंपाने वाली थीं। मैंने इसका अंदाज़ा नहीं लगाया था। वो जून का महीना था। सैलानी सिंगल कपड़े में घूमते हैं इन दिनों। लेकिन सूरज उगने से पहले डल के भीतर का तापमान बहुत ठंडा होता है। थोड़ी ही देर में मेरी दांती बजने लगी। जो जैकेट मैं पहनी थी वो नाकाफ़ी थी इस सर्दी से मुकाबला करने के लिए। मेरी हालत देख उस कश्मीरी को मुझ पर दया आई और उसने एक जैकेट निकल कर मुझे दी.मैंने बिना सोचे समझे जैकेट पहन ली. जब इन्सान मरता है न तो कुछ भी करता है.
रात का अँधेरा छंट रहा था। हवा में पानी की सतह पर चप्पू की आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी।
नानबाई ने रोटियां लगाना शुरू कर दी थीं
डल की खूबसूरती धीरे-धीरे नुमायां हो रही थी। दूर कहीं से अज़ान की आवाज़ आ रही थी। लोग जागने लगे थे। भोर का उजाला माहौल की नीरवता को हर रहा था। तंदूर सुलगने लगे थे! हवा में गेंहूँ के आंच पर तपने की मीठी गंध हवा में घुल रही थी! शायद नानबाई ने रोटियां लगाना शुरू कर दी थीं। कश्मीर की दुनिया में तंदूर का बड़ा महत्त्व है। यहाँ की औरतें चिमटा बेलन से आज़ाद हैं। रोज़ की रोटी नहीं बनानी पड़ती उन्हें। हम डल के अंदरूनी इलाक़े में प्रवेश कर रहे थे। जैसे पतली गलियों में घूम रहे हों। हमारे सर के ऊपर पतली लकड़ी के टुकड़ों को जोड़ कर बना पगडण्डी जैसा पुल पड़ता और उस से गुज़रता कोई नमाज़ी दिख जाता। ये छोटे-छोटे पुल डल के ऊपर तैरते भूखंडों को जोड़ने का काम करते हैं। डल के भीतर ऐसे छोटे होते कितने ही मुहल्ले हैं। ये दुनिया बड़ी ही अनोखी है।
कहवा और नून चाय की गर्म भाप
कुछ दूर चलने पर हमें अचानक से पतली-पतली नावों का झुण्ड दिखा। सब एक ही दिशा में जा रही थीं। हर नाव पर सब्जियां और उनका मालिक अपनी ज़बर्वान के साथ बैठा था। ये लोक सर्दी से बचने के लिए फेरहन पहनते हैं। फेरहन गर्म कपड़े का एक ढीला ढाला कुरता होता है, जिसकी अस्तीनें लम्बी होती है और ज़बर्वान में ये अपने साथ कहवा या नून चाय लेकर चलते हैं। ज़बरवान ताम्बे का एक बर्तन होता है , जिसके नीचे अंगारे रखने की जगह होती है जिस से चाय गर्म रहती है। ये कश्मीरी इस चाय और तंदूर से ख़रीदी रोटियों के साथ पूरा दिन गुज़ार लेते हैं.।
आखरी छोर पर फ्लोटिंग वेजीटेबल मार्केट
डल के आखरी सिरे पर ये फ्लोटिंग वेजीटेबल मार्केट लगती है। बड़ा ही अद्भुत द्रश्य होता है। पानी पर तैरती ये पतली नावें ताज़ी सब्जियों से भरी होती हैं। ये बाज़ार मुश्किल से आधे घंटे की सरगर्मी होती है। अपने छोटे-छोटे खेतों में उगाई सब्जी को किसान यहाँ लाते हैं और जल्दी से बेच कर फ़ारिग हो जाते हैं। अगर आप यहाँ पहुँचने में थोड़ा भी लेट हुए तो ये नज़ारा देखने को नहीं मिलेगा। वैसे यहाँ पहुँचने का एक आसान रास्ता सड़क से होकर भी है जोकि हज़रात बल की दरगाह की सिम्त से आता है। लेकिन ये रास्ता ज्यादा दिलकश है। इसमें डल का असली जीवन है। यहाँ का नज़ारा बेहद खुबसूरत होता है। मैंने खूब तस्वीरें खींचीं और वापस होटल की ओर लौटने लगीं। श्रीनगर शहर जागने लगा था।
(लेखिका फोटोग्राफर, ब्लॉगर, स्टोरीटेलर और फ़ीमेल ट्रैवलर हैं।)
नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं। द फॉलोअप का सहमत होना जरूरी नहीं। हम असहमति के साहस और सहमति के विवेक का भी सम्मान करते हैं।