द फॉलोअप टीम, डेस्क:
भारत के महान एथलिट दिवंगत मिल्खा सिंह ने देश को 4 बार एशियाई केलों में स्वर्ण पदक जीतवाया। साल 1958 में मिल्खा सिंह ने राष्ट्रमंडल खेलों में पहली बार स्वर्ण पदक जीता। 1960 के रोम ओलंपिंक मिल्खा सिंह चौथे स्थान पर रहे। इससे पहले 1956 और बाद में 1964 ओलंपिंक में भी उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया। साल 1959 में मिल्खा सिंह को पद्मश्री से नवाजा गया।
कार्फिक राष्ट्रमंडल खेलों से बनाई वैश्विक पहचान
मिल्खा सिंह ने विश्व स्तर पर पहली बार अपनी पहचान तब बनाई जब उन्होंने कार्फिक राष्ट्रमंडल खेलों में तात्कालीन विश्व रिकॉर्डधारी मैल्कम स्पेंस को 440 मीटर दौड़ में हराकरक स्वर्ण पदक जीता। मिल्खा सिंह ने उस पल को याद करते हुए कहा था कि वो काफी नर्वस थे। तब उनको कोच डॉक्टर हावर्ड ने उनसे कहा था कि ये दौड़ तुम्हें या तो कुछ बना देगी या बर्बाद कर देगी। हावर्ड ने मिल्खा सिंह का कहा कि यदि तुम मेरी टिप्स मानोगे को मैल्कम को हरा दोगे।
अविभाजित भारत में हुआ था मिल्खा सिंह का जन्म
मिल्खा सिंह का जन्म साल 1929 में अविभाजित भारत में हुआ था। बंटवारे को बाद उनको पाकिस्तान की तरफ से भारत आना पड़ा। विभाजन के वक्त भड़की हिंसा में उनके माता-पिता, भाई और दो बहनों की मौत हो गई थी। वे भारत केवल अपनी एक बड़ी बहन के साथ आये थे। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी में 75 से ज्यादा रेस जीती। वो भारत के महान एथलिट थे।
पाकिस्तानी तानाशाह ने दिया फ्लाइंग सिख का खिताब
साल 1060 में उनको पाकिस्तान से एक स्पोर्ट्स मीट में भाग लेने का ऑफर किया गया था। विभाजन के वक्त की बुरी यादों की वजह से मिल्खा सिंह वहां जाने के लिए तैयार नहीं थे। तात्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उनको पाकिस्तान जाने के लिए मनाया था। उनका मुकाबला उस समय पाकिस्तान के सर्वश्रेष्ठ धावक अब्दुल खालिक के साथ हुआ था। मिल्खा सिंह ने उस रेस में अब्दुल खालिक को हरा दिया था। पदक देते समय पाकिस्तान के तात्कालीन राष्ट्रपति फील्ड मार्शल अय्यूब खां ने मिल्खा सिंह से कहा था कि, मिल्खा आज तुम दौड़े नहीं बल्कि उड़े हो। तुम्हें मैं फ्लाइंग सिख का खिताब देता हूं।
मिल्खा सिंह की जिंदगी पर बनी फिल्म भाग मिल्खा भाग
मिल्खा सिंह की व्यक्तिगत और पेशेवर जिंदगी पर एक फिल्म भी बनाई गई थी। उस फिल्म का नाम भाग मिल्खा भाग था। बॉलीवुड अभिनेता फरहान अख्तर ने उस फिल्म में फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह की भूमिका निभाई थी। मिल्खा सिंह ने उस फिल्म के लिए महज 1 रूपये बतौर पारिश्रमिक लिया था। मिल्खा सिंह ने कहा कि कुछ प्रेम एंगल को छोड़कर बाकी 90 फीसदी फिल्म उनकी सच्ची कहानी है। इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर सफलता के कई कीर्तिमान स्थापित किया था।
शरणार्थी कैंप में गुजरा था मिल्खा सिंह का बचपन
मिल्खा सिंह ने अपनी जिंदगी में काफी संघर्ष किया था। बंटवारे के वक्त उनके माता-पिता, भाई और 2 बहनों को मार डाला गया। मिल्खा सिंह का बचपन काफी गरीबी और मुश्किलों में गुजरा। वो काफी लंबे वक्त तक अपनी बड़ी बहन के साथ शरणार्थी कैंपों में रहे। बाद में मिल्खा सिंह सेना में शामिल हो गये। उन्होंने बताया कि सेना में जो लोग स्पोर्ट्स में भाग लेते थे उनको अलग से दूध और अंडा मिलता था। यही सोच कर मिल्खा सिंह भी स्पोर्ट्स में आ गए थे लेकिन बाद में उन्होंने इसे गंभीरता से लिया और भारत के लिए कई पदक हासिल किए। उनकी जिंदगी हमेशा प्रेरणा रहेगी।