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संपादकीय डेस्‍क से: इरफान अंसारी के बयान से क्‍या नहीं आती रंगभेद की बू !

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शहरोज़ क़मर, रांची:
आम धारणा है कि भारत में जाति भेद एक कड़वा सच है। लेकिन पश्चिम जैसा रंगभेद यहां कतई नहीं है। लेकिन क्या सच में ऐसा है। क्या दलित और आदिवासियों के साथ होते आ रहे भेदभाव के पीछे महज जातिभेद ही कारक है या रंग भी एक अहम कारण है। क्या गोरे रंग बनाने के दावे के साथ कॉस्मेटिक कंपनियां अपने उत्पाद के प्रचार नहीं करती। पिछले साल अमेरिका में जॉर्ज फ्लॉयड की मौत के बाद शुरू हुए 'ब्लैक लाइव्स मैटर' प्रोटेस्ट के बाद हिंदुस्तान यूनिलीवर (HUL) को अपने चर्चित प्रोडक्ट 'फेयर एंड लवली' का नाम बदलने को मजबूर नहीं होना पड़ा था। तब हिंदुस्तान यूनीलीवर की पैरेंट कंपनी यूनीलीवर जैसी कंपनियों की बड़ी आलोचना हुई थी कि ये लोग ये कंपनियां गोरेपन की क्रीम बेचकर श्वेत और अश्वेत का भेदभाव बढ़ाती हैं।

भारत में रंगभेद का अपना अलग ही स्वरूप
भारत भी रंगभेद से अछूता नहीं है। भारत में इसका अपना अलग ही स्वरूप है। यह जातिभेद और लिंगभेद से जुड़कर और भयानक हो जाता है। इसके संदर्भ भारतीय साहित्य में प्रचुर मिलते हैं। मन्नू भंडारी और प्रभा खेतान आदि लेखिकाओं की आत्मकथाओं से पता चलता है कि किस प्रकार सांवले रंग ने उनके बचपन में जहर घोला। जिसका असर उनके पूरे व्यक्तित्व पर जिंदगी भर रहा। भारतीय समाज में लड़कियों के लिये सांवला रंग किसी शारीरिक अपंगता जैसा ही बड़ा अभिशाप है। हमारे संविधान में जाति, संप्रदाय, भाषा, क्षेत्र समेत किसी भी प्रकार के रंग और वर्ग भेद के लिए कोई जगह नहीं है। भारत में द्रविण, मंगोल, आर्य आदि सभी नस्लों के लोग सदियों से साथ रहते आए हैं। रंग, क्षेत्र, नस्ल, वेशभूषा आदि के आधार पर होने वाला भेदभाव भारत की अनेकता में एकता की भावना को कलंकित करता है। वह संविधान में निहित समानता की भावना पर आघात पहुंचाता है। उन बेटियों से पूछिये जिनकी शादी महज उनके रंग के सबब नहीं हो पाती है।

अब इरफान अंसारी का बयान
लेकिन झारखंड के जामताड़ा से कांग्रेस के विधायक डॉ. इरफान अंसारी के एक बयान से रंगभेद की बू आती है। हैरत इसलिए भी है कि वो प्रदेश कांग्रेस में कार्यकारी अध्यक्ष भी हैं। उन्होंने कल अपने एक वीडियो बयान में राज्य के पूर्व मंत्री व भाजपा एसटी/एससी मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष अमर कुमार बाउरी को निशाना बनाया है। राजनीतिक कटाक्ष करना दीगर है। वैचारिक मतभेद भी स्‍वस्‍थ्‍य लोकतंत्र के लिए जरूरी है। लेकिन इरफान का यह कहना कि अमर बाउरी दक्षिण भारत के किसी गुंडे की तरह लगते हैं, यह बयान न महज अमर्यादित है बल्कि सरासर रंगभेद का परिचायक है। कांग्रेस खुद को महात्मा गांधी, पंडित नेहरु, डॉ बीआर अंबेडकर और मौलाना अबुल कलाम आजाद की विरासत को आगे बढ़ाने वाली पार्टी कहती है। नेताओं को अपने पुरखों की भी बातों का ख्याल रखना चाहिए,  जिन्‍होंने जिंदगीभर मानवाधिकार की वकालत की। हर तरह के भेदभाव का विरोध किया। 

अंत में अल्लामा इक़बाल का शेर:
खुदा के बंदे तो हैं हजारों बनो में फिरते हैं मारे-मारे
मैं उसका बंदा बनूंगा जिसको खुदा के बंदो से प्यार होगा।