मनोहर महाजन, मुंबई:
कंठकोकिला लता मंगेशकर से जब 1967 में पूछा गया कि उस साल उनके गाये हुए 10 बेहतरीन गाने कौन से हैं? तो उनकी फ़ेहरिस्त में एक ही संगीत निर्देशक के दो गाने थे, ‘..लग जा गले से फिर ये हसीं रात हो न हो..’ और ‘..बैरन नींद न आये...।' ये गाने न तो नौशाद के थे। न शंकर जयकिशन के और न ही लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के। ये नग़मे थे मदन मोहन कोहली या सिर्फ़ 'मदन मोहन' के। संगीतकर मदन मोहन के काम का दायरा इतना बड़ा है कि उसे एक लेख में समेटना नामुमकिन है। हर संगीतप्रेमी जानता है, उनका बग़दाद में 25 जून को पैदा होना। पिता राय बहादुर चुन्नीलाल का 'बॉम्बे टॉकीज़' का संस्थापक होना। संगीत के जुनून के चलते घर से निकाला जाना। संगीत की कोई फॉर्मल ट्रेनिंग न होना। ये सब बातें फ़िल्म संगीत में उनके योगदान के आगे कम ही अहमियत रखती हैं। हम यहां सिर्फ उनकी संगीत की विरासत की बात करेंगे। ग़ज़लों के बेहतरीन कंपोज़र और गायक भी इस बात से इत्तेफ़ाक़ रखते है कि हिंदी-फ़िल्म-संगीत में ग़ज़लों की कंपोज़ीशन मदन मोहन से बेहतर कोई नहीं कर सका। लता मंगेशकर तो उन्हें 'ग़ज़लों का बादशाह' कहती थीं।
मदन मोहन के लिए जब नौशाद ने यह कह दिया
1950 और 60 का दशक हिन्दी सिनेमा का वह दौर था जब नौशाद से बढ़कर कोई संगीतकार नहीं था। नौशाद ने 1975 में एक इंटरव्यू में नौशाद साहब ने कहा था, ‘..आपकी नज़रों ने समझा..’और ‘..है इसी में प्यार की आबरू वो जफ़ा करे मैं वफ़ा करूं..।’ के बदले वो अपना पूरा काम मदन मोहन के नाम कर सकते हैं। यह कुछ ऐसा ही है जैसा ग़ालिब ने एक नए अज्ञात शायर के शेर:
दिल के फफोले जल उठे सीने की आग से।
इस घर को आग लग गई घर के चराग़ से।।
के बदले अपना 'दीवान' देने की बात कही थी। न ग़ालिब अपना दीवान देते। न नौशाद यह सौदेबाज़ी करते। राजू भारतन ‘नौशादनामा’ में इस क़िस्से पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं: ‘नौशाद का मतलब सिर्फ उन्हें श्रद्धांजलि देने का था। पर हां, नौशाद को इस बात का मलाल ज़रूर था कि ग़ज़ल कंपोज़ीशन में वो मदन मोहन से कमतर थे।’
बेगम अख्तर ने जब दोबारा गाना शुरू किया
मदन मोहन का फ़िल्मी सफ़र 1951 में देवेन्द्र गोयल की ‘आंखें’ फ़िल्म से शुरू होता है, पर उनके संगीत में ग़ज़लों की रवानगी ‘ख़ूबसूरत’ (1952) में तलत महमूद की गाई ग़ज़ल ‘मोहब्बत में कशिश होगी तो एक दिन तुमको पा लेंगे’ से शुरू होती है और 1958 में ‘अदालत’ की ग़ज़ल दो ग़ज़लों ‘यूं हसरतों के दाग़ मुहब्बत में धो लिए’ और '..उनको ये शिक़ायत है कि हम कुछ नहीं कहते..' ने तहलक़ा मचा दिया था. इसके साथ ही 'ग़ज़लों का बादशाह' का ख़िताब उनकी झोली में आ गिरा था। मदन मोहन ने ‘दाना पानी’ (1953) में बेग़म अख्तर से कैफ़ इरफ़ानी की ग़ज़ल ‘ऐ इश्क़ मुझे और तो कुछ याद नहीं है’ गवाई। बेग़म अख्तर साहिबा फ़िल्मों के लिए गाना छोड़ चुकी थीं। उनका मदन मोहन के इसरार पर वापस आना इस बात की तस्दीक करता है कि वे ग़ज़ल की कंपोज़ीशन कितनी शिद्दत और ईमानदारी से करते थे। याद रहे बेगम अख़्तर उस समय फ़िल्मों के लिए गाना छोड़ चुकी थीं। पांचवें दशक के बाद बेगम अख़्तर ने यदि किसी के लिए गया तो वे मदन मोहन ही थे।
कर चले हम फ़िदा जां-ओ-तन साथियो....
किसी भी गाने की 'धुन' बनाते समय सटीक राग-रागनी चुनने में उनका कोई सानी नहीं था। जब तक वो ख़ुद मुतमईन नही हो जाते थे उस गाने की तान बनाने में लगे रहते थे। फ़िल्म ‘मौसम’ के गीत ‘दिल ढूंढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन’ के लिए उन्होंने 10 धुनें बनायीं थी.दरअसल, मदन मोहन शब्दों के अंदर छुपे आरोह-अवरोह साथ को पहचानने का ज़बरदस्त माद्दा रखते थे। 1964 में चेतन आनंद ने एक फ़िल्म बनायी थी ‘हकीक़त’। चेतन आनंद मदन मोहन की क्षमता से परिचित थे। यहां उन्होंने मदन मोहन को कैफ़ी आज़मी के साथ जोड़ा.परिणम? ‘मैं ये सोचकर उस दर से उठा था..’ आप जब भी सुनें एक अलग ही अनुभूति देती है। और इस फिल्म के आख़िर में जब ‘कर चले हम फ़िदा जां-ओ-तन साथियों’ गीत बजता है तो मजाल है कि दर्शक से उठकर चल दे। वो आंखों से झरझर आंसू बहता सम्मोहित सा बैठा रहता था। ऐसा असर था मदन मोहन का। बाद में मदन मोहन और कैफ़ी आज़मी ‘हीर रांझा’(1970), ‘हंसते ज़ख्म’(1973) में फिर साथ आये। गीतों का ऐसा तिलिस्म पैदा हुआ जो आज भी संगीतप्रेमियों के सर चढ़कर बोलता है। कैफ़ी आज़मी के अलावा राजेंद्र कृष्ण और राजा मेहंदी अली खान भी मदन मोहन के सबसे पसंदीदा गीतकार रहे!
लता मंगेशकर मानती थीं मदन मोहन को भाई
बीच का एक ऐसा दौर भी आया जब मदन मोहन समय की मांग के अनुसार हल्का-फुल्का संगीत दे रहे थे, पर कुछ ख़ास बात बन नहीं रही थी। फिल्में चल नहीं रही थीं. तभी 1956 में आई ‘भाई-भाई’. इसका गाना :'..क़दर जाने न मोरा बालम बेदर्दी..' ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए. पिक्चर हिट हुई। मदन मोहन के सिर से ‘फ्लॉप’ वाला टैग हट गया।बेगम अख़्तर ये ठुमरी नुमा गाना इतना भाया की उन्होंने दिल्ली से ट्रंककॉल करके मदन मोहन से इसे अनेकों बार सुना। लता मंगेशकर मदन मोहन को भाई मानती थीं और मदन मोहन भी उसी तरह उनसे पेश आते थे.लता ने उनकी पहली फिल्म ‘आंखें’ के लिए गाना नहीं गया था। कारण? लता जी को लगा था कि इतने बड़े बाप का बेटा शौकिया ही काम कर रहा है। लिहाज़ा उन्होंने मदन मोहन को गंभीरता से नहीं लिया। पर जब ‘आंखें’ का संगीत हिट हुआ तो उन्होंने अपनी राय बदल ली और फिर वे एक दूसरे के पूरक बन गए. फ़िल्म ‘मदहोश’ से शुरू हुआ सफ़र फिर कभी नहीं रुका।
लता और तलत न होते तो .....
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि मदन मोहन उतने पाए के संगीतकार न होते यदि उन्हें लता मंगेशकर और तलत महमूद जैसे पार्श्वगायकों का साथ न मिलता। लता जी और मदन मोहन का समीकरण आज 'किवदंती' बन चुका है। इन दोनों को ग़ज़लों का जिस्म और रूह कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। फ़िल्म ‘वो कौन थी’ के गीत ‘लग जा गले कि फिर ये हसीं रात हो न हो’, ‘नैना बरसे रिमझिम’ और फ़िल्म ‘मेरा साया’ के गीत: ‘नैनों में बदरा छाए बिजली सी चमके हाय’ और 'सर्वकालिक' महान गीतों में से एक : ‘तू जहां जहां चलेगा, मेरा साया साथ होगा’-मेरी बात की तसदीक़ करते हैं।
(मनोहर महाजन शुरुआती दिनों में जबलपुर में थिएटर से जुड़े रहे। फिर 'सांग्स एन्ड ड्रामा डिवीजन' से होते हुए रेडियो सीलोन में एनाउंसर हो गए और वहाँ कई लोकप्रिय कार्यक्रमों का संचालन करते रहे। रेडियो के स्वर्णिम दिनों में आप अपने समकालीन अमीन सयानी की तरह ही लोकप्रिय रहे और उनके साथ भी कई प्रस्तुतियां दीं।)
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