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सत्ता को हमेशा जवाबदेही और नैतिक व्यवस्था से नियंत्रित किया जाना चाहिएः रबींद्र नाथ महतो

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द फॉलोअप डेस्क
 
स्पीकर रबींद्रनाथ महतो ने कहा कि सत्ता को हमेशा जवाबदेही और नैतिक व्यवस्था द्वारा नियंत्रित किया जाना चाहिए। मोंटेस्क्यू ने बाद में शक्तियों के पृथक्करण के अपने सिद्धांत में जिसे संहिताबद्ध किया, भारत के प्राचीन ग्रंथों में पहले से ही निहित थाः कि स्थिरता तभी आती है जब अधिकार विभाजित और सामंजस्यपूर्ण होता है,न कि केंद्रित हों। हमारे संविधान के प्रमुख निर्माता डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने इस संतुलन को उल्लेखनीय स्पष्टता के साथ समझाया। उन्होंने कहा, "संघवाद का मूल सिद्धांत यह है कि विधायी और कार्यकारी प्राधिकरण केंद्र और राज्यों के बीच विभाजित होता है, केंद्र द्वारा बनाए गए किसी कानून द्वारा नहीं बल्कि संविधान द्वारा ही" यह योजना न केवल राष्ट्रीय एकता की रक्षा करती है, बल्कि प्रांतीय स्वायत्तता को भी पोषित करती है, यह सुनिश्चित करते हुए कि भारत में लोकतंत्र उतना ही विविध है जितना कि यह लोगों की सेवा करता है। वह बारबाडोस एसेंबली में विभिन्न देशों के राजनयिकों के बीच अपनी बात रख रहे थे। विषय था-“राष्ट्रीय संसद बनाम प्रांतीय, प्रादेशिक और विकेंद्रीकृत विधान - शक्ति के पृथक्करण की रक्षा और संरक्षण”।

महतो ने कहा कि राष्ट्रीय संसदें और प्रांतीय विधानसभाएं सर्वोच्चता के लिए प्रतिद्वंद्वी नहीं हैं; वे लोकतंत्र के पूरक स्तंभ हैं। प्रत्येक का अपना जनादेश होता है, लेकिन वे मिलकर यह सुनिश्चित करते हैं कि शासन के हर स्तर पर लोगों की आवाज सुनी जाए। लोकतंत्र की वास्तविक ताकत इस बात में नहीं है कि किसी संस्थान के पास कितनी शक्ति है, बल्कि यह है कि वह कितनी जिम्मेदारी से खुद को अतिक्रमण से रोकता है। भारत में झारखंड विधान सभा के अध्यक्ष के रूप में, मैंने देखा है कि कैसे यह संतुलन लोगों को सशक्त बनाता है। हमारे जैसे विविधतापूर्ण देश में, एक दूरदराज के गांव में किसान की आवाज, एक औद्योगिक शहर में युवाओं की आकांक्षाएं और हमारे जंगलों में स्वदेशी समुदायों की चिंताओं को विधायी प्रक्रिया में जगह मिलनी चाहिए। यह तभी संभव है जब राष्ट्रीय और प्रांतीय विधानसभाएं एक-दूसरे के पूरक हों-राष्ट्रीय एकता की रक्षा करने वाली संसद और स्थानीय पहचान और आकांक्षाओं का पोषण करने वाली प्रांतीय विधानसभाएं। कार्यशाला में उप सभापति हरिवंश,विधायक नवीन जयसवाल तथा ऑस्ट्रेलिया और कनाडा के  पार्लियामेंट्रियन भी उपस्थित रहे।

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