द फॉलोअप डेस्क
छपरा के मढौरा से आई एक शर्मनाक घटना ने समाज की संवेदनाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जवईनियां गांव की रहने वाली बबीता देवी की पटना में इलाज के दौरान मृत्यु के बाद, समाज की बेरुखी ऐसी रही कि शव को श्मशान तक ले जाने के लिए चार कंधे भी नसीब नहीं हुए। पति को पहले ही खो चुकी बबीता के अंतिम सफर में न तो कोई रिश्तेदार पहुंचा और न ही गांव वाले।.jpeg)
कठिन समय में जब समाज और अपनों ने मुंह मोड़ लिया, तब मृतका की दो बेटियों, मौसम और रौशन ने साहस का परिचय दिया। समाज की पुरानी परंपराओं को तोड़ते हुए इन दो बहनों ने खुद अपनी मां की अर्थी उठाई और श्मशान घाट तक ले गईं। बड़ी बेटी मौसम ने रोते हुए मां को मुखाग्नि दी। यह दृश्य देखकर हर किसी की आंखें नम थीं कि कैसे गरीबी के कारण एक परिवार अपने ही समाज में इतना अकेला हो गया।
मृतक की बेटियों ने बताया कि उनकी मां लंबे समय से टीबी की बीमारी से जूझ रही थीं। आर्थिक तंगी के कारण परिवार पहले ही टूट चुका था और रिश्तेदारों ने भी दूरी बना ली थी। मौसम और रौशन के अनुसार, उन्होंने मदद के लिए कई लोगों से गुहार लगाई, लेकिन कोई भी दाह संस्कार में शामिल होने नहीं आया। अंततः अपनी मां के सम्मान के लिए बेटियों ने खुद ही सारी रस्में निभाने का फैसला किया।.jpg)
अंतिम संस्कार के बाद अब इन बेसहारा बेटियों के सामने मां के श्राद्ध कर्म और तेरहवीं का संकट खड़ा हो गया है। यह घटना दिखाती है कि आज भी समाज में आर्थिक स्थिति तय करती है कि आपको अपनों का साथ मिलेगा या नहीं। दो बेटियों का अकेले अर्थी लेकर जाना हमारी सामूहिक नैतिकता पर एक बड़ा धब्बा भी है। फिलहाल, दोनों बेटियां प्रशासन से मदद की गुहार लगा रही हैं ताकि वे अपनी मां का अंतिम कार्य सम्मानपूर्वक पूरा कर सकें।