व्यंकटेश पांडेय/ पटना
पटना का ऐतिहासिक गांधी मैदान आज यानि 29 जून को खचाखच भरा रहा। क्या भीतर और क्या बाहर, चारों तरफ लोग ही लोग। गांधी मैदान जहां राजनीतिक और गैर राजनीतिक जलसे अक्सर होते रहते हैं। आज इमारत-ए-शरिया के कॉल पर लाखों की संख्या में मुस्लिम समुदाय के लोग इकट्ठा हुए थे। मुद्दा था वक्फ संशोधन विधेयक का विरोध। हुकूमत को यह बताना कि अल्पसंख्यक समुदाय को सरकार का यह संशोधन नामंजूर है।
वैसे तो इस जुटान का कॉल इमारत-ए-शरिया ने लिया था, जो कि एक धार्मिक व सामाजिक संस्था है। जिसका काम या आधार बिहार समेत आसपास के राज्यों में देखा और दर्ज किया जाता है। ऐसे में बहुतों के जेहन में इस तरह के सवाल भी उठते रहे कि क्या इनके कॉल पर लाखों की संख्या में लोग इकट्ठा होंगे जैसा कि संगठन का दावा था, लेकिन लोग तो जुटे और खूब जुटे। उमस भरी गर्मी के बावजूद जितने लोग गांधी मैदान के भीतर दिखे उससे कहीं अधिक बाहर।
गांधी मैदान में ठीक उसी जगह एक हैंगर मंच सजा था जहां आम तौर पर लगा करता है। मंच पर देश के अलग-अलग हिस्से और राजनीतिक दलों के नुमाइंदे भी मौजूद थे। मसलन, पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद, कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी,बिहार में कांग्रेस विधायक दल के नेता शकील अहमद खान, भाकपा (माले) के राष्ट्रीय महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य, पूर्णिया सांसद पप्पू यादव, एआईएमआईएम विधायक अख्तरुल ईमान तो वहीं बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव समेत कई अन्य माननीय।
अब इस बात से तो शायद ही कोई नावाकिफ हो कि बिहार में इसी साल चुनाव होने हैं, ऐसे में चारों तरफ तरह-तरह के जलसे और प्रदर्शन हो रहे हैं। कहीं अलग-अलग जातियों के सम्मेलन तो कहीं हुक्मरानों तक अपनी बातें पहुंचाने के लिए इस तरह के जुटान। जाहिर है कि जहां जुटान होगा वहां राजनीतिक दलों के नुमाइंदे भी पहुंचेंगे। जैसे गुड़ के पास पहुंचती हैं चीटियां।
तेजस्वी बोले- 'हिंदुस्तान किसी के बाप का थोड़े है'
गौरतलब है कि गांधी मैदान के जलसे में बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव भी पहुंचे थे। मौके पर उन्होंने भाजपा को आड़े हाथ लेते हुए कहरा कि यह देश किसी के बाप का देश नहीं है। यह देश हम सबका है। उन्होंने आगे कहा कि हमारे स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में चाहे हिंदू हो या मुसलमान, सिख हो या ईसाई सभी ने इस देश की आजादी के लिए कुर्बानी देने का काम किया है, और बीजेपी के लोग गरीब, पिछड़ा और दलित वोट बैंक छीनने में लगे हैं। दरअसल, तेजस्वी के इस भाषण को उनके पिछली प्रेस वार्ता के विस्तार के तौर पर भी देखा जा सकता है जहां वे चुनाव आयोग पर भाजपा के इशारे से चलने का आरोप लगा रहे थे। क्योंकि चुनाव से लगभग 3 महीने पहले चुनाव आयोग ने वोटर लिस्ट का मेगा वेरिफिकेशन शुरू करने का ऐलान किया है और यह काम शुरू भी हो चुका है।

रैली में नहीं दिखी आधी आबादी
गांधी मैदान में वैसे तो आज लाखों लोग इकट्ठा हुए थे, लेकिन इसमें सिर्फ पुरुष या लड़के ही दिखे। आधी आबादी या कहें कि महिलाएं नदारद रहीं। लोगों के हाथों में तिरंगे थे तो वहीं नारा-ए-तदबीर। अल्ला-हु-अकबर के नारे भी बुलंद हो रहे थे, लेकिन आधी आबादी की आवाज इस कोरस में शामिल नहीं दिखी। अब इस बात पर चिंतन और मनन तो अल्पसंख्यक समुदाय को करना होगा कि आखिर आधी आबादी है कहां? क्या उन्हें सबकुछ जानते-समझते हुए लाया नहीं गया या फिर वो खुद ही ऐसे जलसों से दूर रहती हैं। जब वक्फ करने वालों में पुरुष और महिलाएं सभी हैं तो एहतजाज सिर्फ मर्द समाज ही क्यों करे?
इमारत-ए-शरिया का आह्वान
गांधी मैदान में 'वक्फ बचाओ, संविधान बचाओ' रैली का आह्वान इमारत-ए-शरिया नामक धार्मिक व सामाजिक संगठन ने किया था। जो कि लगभग 100 साल पुरानी संस्था है। इस रैली की कमान मौलाना अहमद वली फैजल रहमानी समेत संस्था के अन्य लोगों के हाथों में रही। इनके ही बुलावे पर अलग-अलग दलों के नुमाइंदे भी रैली में शरीक होने पहुंचे थे। इस संस्था का प्रभाव विशेषतया बिहार, झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में दिखता है।ऐसे में रैली में पहुंचे तमाम लोग एक सुर में वक्फ संशोधन के खिलाफ बोलते देखे-सुने गए। सबका यही कहना रहा कि सरकार उनके हक-हकूक के साथ खिलवाड़ कर रही है, और उन्हें यह कतई पसंद नहीं। 
मुस्लिम संगठन और सरकार आमने-सामने
यहां इस बात को बताना जरूरी हो जाता है कि वक्फ संशोधन बिल लगभग दो महीने पहले यानी 4 अप्रैल 2025 को संसद से पारित हुआ। जिसके बाद 5 अप्रैल को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हस्ताक्षर के बाद ये विधेयक बन गया। तीन दिन बाद यानी 8 अप्रैल को इसके लिए सरकार ने अधिसूचना भी जारी कर दी। हालांकि इससे नाइत्तेफाकी जताने वाले लोगों और नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। वक्फ संशोधन के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में लगभग 100 से अधिक याचिकाएं दायर की गईं। दायर याचिकाओं में इसे असंवैधानिक और मुस्लिम समुदाय के धार्मिक अधिकारों का हनन कहा जा रहा। न्यायालय ने इस मामले में सुनवाई अप्रैल में ही शुरू कर दी थी।
सर्वोच्च अदालत ने फैसला रखा सुरक्षित
वक्फ संशोधन के खिलाफ जहां सौ से अधिक याचिकाएं पड़ी हैं, वहीं सरकार भी अपना पक्ष रख रही है। सरकार का कहना है कि यह कानून संवैधानिक है और इसे संयुक्त संसदीय समिति यानी JPC की 36 बैठकों और 97 लाख हितधारकों के सुझावों के बाद बनाया गया। सरकार का इस मसले पर आगे कहना है कि यह धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप नहीं करता, बल्कि संपत्ति प्रबंधन को पारदर्शी बनाता है। केंद्र सरकार ने हलफनामा दाखिल कर कहा कि कानून संवैधानिक है और इसमें मुस्लिम महिलाओं के हितों का संरक्षण है। साथ ही केंद्र ने यह भी दावा किया कि 2013 के बाद वक्फ संपत्तियों में 20 लाख एकड़ से ज्यादा का इजाफा हुआ, जिससे विवाद बढ़े हैं। सभी पक्षों को सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 22 मई 2025 को फैसला सुरक्षित रख लिया और यह तय करेगा कि कानून पर अंतरिम रोक लगेगी या नहीं।
अंत में हम आपको यह बताते चलें कि मंच से बोलने वाले कई स्पीकर यह कहते देखे-सुने गए कि गांधी मैदान की रैली तो अभी शुरुआत भर है, और यदि सरकार नहीं चेतती है तो फिर वे दिल्ली की ओर रुख करेंगे। इस बिल का विरोध जारी रहेगा। गांधी मैदान के बाद अब अगला टार्गेट दिल्ली का रामलीला मैदान है।