व्यंकटेश पांडेय/पटना
बिहार में चल रहा मतदाता सूची विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) पर देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट में आज यानी गुरुवार को सुनवाई हुई। इस दौरान अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुना। दोनों पक्षों को सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग (EC) को बड़ी राहत दी और वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण पर रोक नहीं लगाया। हालांकि कोर्ट ने आयोग से डॉक्यूमेंट के तौर पर आधार, वोटर कार्ड और राशन कार्ड को शामिल करने को कहा।
मतदाता सूची विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर कल पूरा दिन बिहार की सड़कों पर गहमागहमी रही, और ऐसा लग रहा था कि देश की सियासत का केंद्र पटना ही बन गया है। जहां कांग्रेस के दिग्गज नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, बिहार विधानसभा में विरोधी दल के नेता तेजस्वी यादव VIP के मुकेश सहनी, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के दीपांकर भट्टाचार्य समेत कई नेता मार्च के दौरान नजर आए। बिहार के अन्य जगहों से भी चक्का जाम और ट्रेन रोकने की खबरें दिनभर सुर्खियों में रही।
बता दें कि ADR यानी एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स, राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा और तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर इस प्रक्रिया को असंवैधानिक बताया था। चयनकर्ताओं का तर्क था कि ऐसे दस्तावेज लोग कहां से दे पाएंगे। समाज के हाशिए पर रहने वाले समुदायों, विशेषकर मुस्लिम, अनुसूचित जाति, जनजाति, और प्रवासी मजदूरों के लिए ये कागजात देना लगभग असंभव सा है। वहीं अपनी याचिका में ADR ने दावा किया है कि इस प्रक्रिया से लगभग 3 करोड़ मतदाता मताधिकार से वंचित हो सकते हैं, जो संविधान के अनुच्छेद 326 का उल्लंघन है।
बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की वजह से सियासी तूफान मचा है। निर्वाचन आयोग द्वारा पिछले महीने (24 जून 2025) शुरू किए गए इस अभियान का उद्देश्य वोटर लिस्ट को और पारदर्शी बनाना है। वही जो कागजात इसके लिए मांगे जा रहे थे, उस दस्तावेज को आम लोगों को देना एक टेढ़ी खीर है। हालांकि इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक राहत जरूर दी है लेकिन ये देखना दिलचस्प होगा कि सुप्रीम कोर्ट की बात कितनी अमल में आती है।
महागठबंधन के नेता और कई सामाजिक संगठन बिहार में चल रहे वोटर लिस्ट वेरिफेकेशन को लोकतंत्र पर हमला बता रहे हैं और इसे 'वोटबंदी' करार दे रहे हैं। विपक्षी नेताओं का कहना है कि इस प्रक्रिया से गरीब,दलित, और अल्पसंख्यक समुदायों के लोग मताधिकार से वंचित रह जाएंगे। साथ ही इन नेताओं ने इस प्रक्रिया को एक सत्ता दल का साजिश भी करार दिया है। 
इलेक्शन कमीशन की माने तो बिहार में 7.89 करोड़ मतदाताओं की पात्रता की जांच के लिए यह अभियान शुरू किया गया है। इस अभियान के जरिए सभी वोटरों को Enumeration Form भरना होगा। वहीं साल 2003 के बाद पंजीकृत मतदाताओं को अपनी नागरिकता साबित करने के लिए दस्तावेज जमा करने होंगे। आयोग का कहना है कि यह प्रक्रिया जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और मतदाता पंजीकरण नियम 1960 के तहत है, जिसका मकसद डुप्लिकेट, मृत, या अपात्र व्यक्तियों का नाम हटाना है।
फिलाहल इस वक्त सबकी निगाहें 28 जुलाई पर टिकी हैं, जब सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर अगली सुनवाई में अपना रुख स्पष्ट करेगा।