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हजारीबाग : सदियों पुरानी परंपरा में डूबा गांव, 'दशामशा जो-जो' के साथ दीपावली के बाद हुई अशुभता की विदाई

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द फॉलोअप डेस्क
ग्रामीण इलाकों में दीपावली का उत्सव आज भी पूरी पारंपरिक आस्था, श्रद्धा और रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। दीपावली के अगले दिन यहां एक विशेष परंपरा निभाई जाती है, जिसे "दशामशा भगाने" की परंपरा कहा जाता है। यह परंपरा सदियों पुरानी है, जिसका उद्देश्य नकारात्मक ऊर्जा को दूर करना और सुख-समृद्धि की कामना करना होता है।
इस दिन ग्रामीण लोग पुराने बांस से बने सूप, डलिया, टोकरी और दौरा लेकर अपने घरों से निकलते हैं। ये वस्तुएं एक लंबी छड़ी में बाँधकर या हाथ में लेकर पूरे गांव का सामूहिक रूप से भ्रमण किया जाता है। इस सामूहिक यात्रा में गांव के बुजुर्ग, युवा, महिलाएं और बच्चे सभी उम्र के लोग पूरे उत्साह और श्रद्धा से हिस्सा लेते हैं। भ्रमण के दौरान ये बांस की वस्तुएं बजाई जाती हैं, जिससे वातावरण में एक विशेष प्रकार की ध्वनि और ऊर्जा उत्पन्न होती है। पूरा गांव भ्रमण करने के बाद सभी लोग गांव के मुख्य चौराहे पर एकत्रित होते हैं। वहां सामूहिक रूप से इन बांस की बनी वस्तुओं को विधिपूर्वक जलाया जाता है। जलाने के समय "दशामशा जो-जो!" जैसे पारंपरिक नारे लगाए जाते हैं, जो इस क्रिया को और भी जीवंत और आध्यात्मिक बना देते हैं।
स्थानीय मान्यता है कि यह परंपरा घर-परिवार की दरिद्रता, कलह और नकारात्मक शक्तियों को दूर करती है। बांस की वस्तुओं का जलाना बीते हुए दोषों, बुराइयों और दुर्भाग्य के प्रतीकात्मक अंत को दर्शाता है। यह परंपरा न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान का भी प्रतीक है। "दशामशा भगाने" जैसी परंपराएं नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य करती हैं और यह दिखाती हैं कि ग्रामीण भारत आज भी अपनी सांस्कृतिक धरोहरों को कितनी मजबूती से संजोए हुए है।

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