द फॉलोअप डेस्क
हजारीबाग के शांत और हरे-भरे जंगलों में 14 दिन पहले एक दर्दनाक घटना सामने आई। एक लकड़बग्घा, जो प्रकृति का अहम प्रहरी माना जाता है, लहूलुहान हालत में मिला। उसका जबड़ा बुरी तरह फटा हुआ था कारण बेहद खौफनाक था। पत्थर तोड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाला बारूद उसने गलती से खा लिया था। यह विस्फोटक उसके लिए मौत से सीधी मुठभेड़ बन चुका था।
जैसे ही यह खबर हजारीबाग के वन विभाग और रेस्क्यू टीम तक पहुंची, कार्रवाई में एक पल की देरी नहीं की गई। घायल लकड़बग्घे को सुरक्षित पकड़ा गया और तत्काल इलाज शुरू हुआ। शुरुआती दिन आसान थे क्योंकि वह निश्चल पड़ा था शरीर में हलचल तक नहीं। लेकिन जैसे-जैसे दवा असर करने लगी, उसका स्वाभाविक जोश लौट आया और उसके साथ इलाज की चुनौती भी कई गुना बढ़ गई। वन प्रेमी मुरारी सिंह याद करते हुए कहते हैं, जब वह पूरी ताकत से छटपटाता था, उसे काबू में रखकर इंजेक्शन लगाना किसी जंग से कम नहीं था। लेकिन हार मानना हमारे लिए विकल्प ही नहीं था।
टीम ने दिन-रात उसकी देखभाल की कभी इंजेक्शन, कभी पट्टियां, कभी उसके डर और गुस्से को शांत करने की कोशिश। 14 दिनों के अथक प्रयास के बाद आज वह न सिर्फ पूरी तरह स्वस्थ है बल्कि अपनी पुरानी रफ्तार के साथ जंगल की ओर लौट गया। लकड़बग्घा न केवल एक विलुप्तप्राय प्रजाति है बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा भी है। झारखंड में, खासकर हजारीबाग, इनका गढ़ माना जाता है। लेकिन खदानों में इस्तेमाल होने वाला बारूद इनके लिए जानलेवा बन चुका है।
आज की इस कहानी में खुशी इस बात की है कि मौत के मुहाने से एक जिंदगी को खींच लाने वाली टीम की मेहनत रंग लाई है। जब वह लकड़बग्घा जंगल की ओर दौड़ता हुआ गया, उसकी हर छलांग में आज़ादी, जीवन और उम्मीद की झलक थी और पीछे खड़े हर शख्स की आंखों में संतोष के आंसू।
