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झारखंड कांग्रेस के दोनों महत्वपूर्ण पदों पर ओबीसी, क्या प्रदेश अध्यक्ष बदलेंगे

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द फॉलोअप डेस्क
कांग्रेस अपने संगठनात्मक सुधार की दिशा में तेजी से प्रयास शुरू कर दिया है। पिछले दिनों रांची में इसको लेकर मंथन का दौर चला। पुराने विधानसभा सभागार में हुए मंथन में कई चीजें निकल कर सामने आयी। कार्यकर्ताओं-नेताओं को आम लोगों के मुद्दे को लेकर आगे आने ही सलाह दी गयी। यहां तक कि गंभीर मुद्दों पर नेताओं-कार्यकर्ताों को सरकार के खिलाफ तक जाने के निर्देश दिए गए। इसके बाद दिल्ली में हुई जिलाध्यक्षों की बैठक में लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी ने जिलाध्यक्षों की ताकत बढ़ाने पर जोर दिया। पार्टी संगठन की सबसे महत्वपूर्ण जिला इकाई को प्रभावी बनाने की बात कही। उन्होंने यहां तक कहा कि आनेवाले दिनों में टिकट बंटवारे में जिलाध्यक्षों की अनुशंसा का प्रावधान किया जा सकता है। लेकिन इन प्रयासों के बीच प्रदेश कांग्रेस में जातीय-सामाजिक समीकरण को दुरुस्त करने का मुद्दा भी उठने लगा है। प्रदेश कांग्रेस के दो महत्वपूर्ण पदों पर ओबीसी का रहना, वोट की राजनीति के दृष्टिकोण से उचित नहीं बताया जा रहा। कांग्रेस के शीर्ष नेताओं तक इस विषय को गंभीरता से उठाया गया है। उसके बाद से यह कयास लगाया जाने लगा है कि क्या प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष बदलेंगे।


यहां मालूम हो कि प्रदेश कांग्रेस में दो सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावी पद हैं। प्रदेश अध्यक्ष और विधायक दल का नेता। प्रदेश अध्यक्ष के पद पर केशव महतो कमलेश हैं। विधायक दल के नेता पद पर प्रदीप यादव। दोनों ही ओबीसी समुदाय से आते हैं। जबकि झारखंड में ओबीसी समुदाय कांग्रेस का कोर वोटर नहीं रहा है। झारखंड में ईसाई, मुसलिम, आदिवासी और उच्च जाति के मतदाता कांग्रेस के कोर वोटर रहे हैं। उच्च जाति के मतदाताओं में भाजपा बहुत पहले सेंध लगा चुकी है। धीरे धीरे ईसाई, मुसलिम और ईसाई मतदाताओं का रुझान झामुमो की ओर बढ़ रहा है। यह कांग्रेस की कमजोर नस है। इस दृष्टि से कांग्रेस के लिए जातीय समीकरण की कड़ी को फिर से जोड़ने की मजबूरी भी दिखती है।


प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद के क्यू में कई नाम
प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए पर्दे के पीछे कई नाम गिनाए जाने लगे हैं। उनमें बंधु तिर्की, सुखदेव भगत, कालीचरण मुंडा के अलावा मुसलिम समाज से फुरकान अंसारी और शहजादा अनवर का नाम लिया जा रहा है। बंधु तिर्की उस समय भी अध्यक्ष पद के सबसे प्रबल दावेदार थे, जब राजेश ठाकुर को हटा कर किसी दूसरे को यह जिम्मेदारी दी जा रही थी। लेकिन विरोधी लॉबी के मजबूत हो जाने के कारण बंधु उस समय सफल नहीं हो सके थे। बंधु इस बार फिर सफल नहीं हुए तो कालीचरण मुंडा और सुखदेव भगत में जबरदस्त प्रतिस्पर्धा होने की संभावना है। मालूम हो कि कालीचरण मुंडा के पिता टी मुचिराय मुंडा झारखंड के लिए बनी क्षेत्रीय कांग्रेस कमेटी के पहले अध्यक्ष थे। मुचि राय मुंडा की राजनीतिक बिरासत पर ही आगे चल कर कालीचरण मुंडा और नीलकंठ सिंह मुंडा झारखंड की राजनीति में पले, पनपे और आगे बढ़े। फुरकान अंसारी के लिए एक ही कमजोर कड़ी है। उनके पुत्र इरफान अंसारी राज्य सरकार में मंत्री हैं।

ओबीसी का कांग्रेस गणित

2024 के विधानसभा चुनाव में ओबीसी का कांग्रेस गणित काम नहीं आया। कांग्रेस के कुल 16 विधायक जीते। इनमें ओबीसी से मात्र प्रदीप यादव और ममता देवी ही जीत हासिल कर सकी। इसमें प्रदीप यादव के जीतने के पीछे अपना जनाधार और ममता देवी को हत्या के मामले में हुई सजा पर कोर्ट के स्टे से मिली सहानुभूति को ज्यादा प्रभावी कारक माना जाता है। इसके इतर कांग्रेस ने जिन अन्य ओबीसी नेताओं को टिकट दिया, वे हार गए। उनमें अरुण साहु, अंबा प्रसाद, जेपी पटेल, बन्ना गुप्ता, जलेश्वर महतो, लाल सूरज और सुधीर चंद्रवंशी प्रमुख हैं। इस कारण कांग्रेस के शीर्ष दोनों पदों पर ओबीसी को बैठाने की रणनीति को वोट की राजनीति में उपयुक्त नहीं माना जा रहा है।

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