द फॉलोअप डेस्क:
पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन ने आदिवासी इलाकों में चर्चा की बढ़ती संख्या पर उनके बयान को लेकर मचे हंगामे का जवाब दिया है। चंपाई सोरेन ने कह कि धर्मांतरित लोग परेशान हैं कि मैंने चर्चा की बात, तो मंदिरों की क्यों नहीं। चंपाई सोरेन ने कहा कि मैं स्पष्ट कर दूं कि प्रदेश के अधिकांश गांवों में आदिवासी-मूलवासी साथ रहते हैं जहां हजारों वर्षों से जाहेरस्थान, सरनास्थल, देशाउली और मांझी थान के साथ सनातन मंदिर भी हैं।
चंपाई सोरेन ने तर्क दिया कि आदिवासी-मूलवासी समुदाय परस्पर पूजा-स्थलों में सिर झुकाते हैं और एक-दूसरे के पर्व त्याहारों में भी हिस्सा लेते हैं। यहां दोनों की आस्था का सम्मान होता है।

आदिवासी-मूलवासी साहचर्य में रहते हैं
दिउड़ी और रंकिणी मंदिर का उदाहरण देते हुए चंपाई सोरेन ने कहा कि यहां पाहन, अनुष्ठान करवाते हैं और सनातनी भी पूजा करते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि हम भी सनातनियों के पर्व-त्योहारों में शामिल होते हैं। उन्होंने कहा कि आदिवासी-मूलवासी के बीच परस्पर आस्थाओं का सम्मान है, लेकिन हमारी जीवनशैली नहीं बदली। उन्होंने कहा कि पेड़ के नीचे बैठकर पूजा करने वाले हम आदिवासियों का जन्म, विवाह और मृत्यु तक जीवनशैली स्पष्ट है। नामकरण, शादी और अंतिम संस्कार तक रीति-रिवाजों का पालन मांझी परगना, नायके, पाहन, मानकी, मुंडा और पड़हा राजा कराते हैं।
चंपाई सोरेन ने कहा कि सनातनियों ने कभी हमारी आस्था या जीवनशैली बदलने को मजबूर नहीं किया। मौजूदा समय में धर्मांतरण की रफ्तार से लगता है कि यदि उन्होंने भी ऐसा किया होता तो हमारी संस्कृति बहुत पहले खत्म गई होती।

सनातनियों ने लालच देकर धर्मांतरण नहीं किया
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि इतिहास में आपको एक भी उदाहरण नहीं मिलेगा जहां किसी मूलवासी अथवा सनातनी ने सहायता या सहयोग के बदले लालच या धमकी देकर आदिवासियों का धर्मांतरण कराने का प्रयास किया हो। वे ना तो खुद को आदिवासी बताते हैं और ना ही कभी हमारे आरक्षण समेत अन्य अधिकारियों को छीनने अथवा अतिक्रमण करने का प्रयास करते हैं। उन्होंने कहा कि 1845 में धर्म-प्रचार शुरू करने वाले ईसाई मिशनरियों ने महज 180 वर्षों में हमारी परंपरा और धार्मिक आस्था को चोट पहुंचाई है। आरक्षण पर कब्जा किया, भाषा और लिपि का विरोध करके हमारे अस्तित्व को मिटाने का हरसंभव प्रयास किया।
उन्होंने दावा किया कि लाखों लोगों का धर्मांतरण करके ऐसे हालात बना दिए गए हैं कि सिमडेगा समेत झारखंड के कई हिस्सों में जाहेरथान और सरनास्थलों पर ताला लग चुका है। वहां धर्मांतरण की वजह से कोई पूजा करने वाला ही नहीं बचा।

विश्व में कई जनजातियों का अस्तित्व खत्म किया
चंपाई सोरेन ने कहा कि लैटिन अमेरिका की अयोरेओ जनजाति, केन्या की संबुरु जनजाति, ब्राजील की वाई-वाई, फिजी और पैसिफिक आईलैंड की जनजातियां धर्मांतरण की वजह से अपनी मूल संस्कृति भूल चुकी है। उनके पारंपरिक रीति-रिवाज, त्योहार, भाषा, नृत्य, पूजा-पाठ और सामाजिक संरचना खत्म कर दी गई है। चंपाई सोरेन ने सवाल किया कि मिशनरियां खुलकर क्यों नहीं कहती कि भारत में भी असली मकसद यही है। उन्होंने कहा कि धर्मांतरण राजनीतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि समाज के अस्तित्व से जुड़ा है।

आदिवासी महापुरुषों की शिक्षा मानना जरूरी है
चंपाई सोरेन ने कहा कि धरती आबा बिरसा मुंडा, सिद्धो-कान्हू, पोटो-हो, टाना भगत, तेलंगा खड़िया समेत अन्य मार्गदर्शकों के दिखाए राह पर चलते हुए अगर हमने अपनी पंरपरांओ को नहीं बचाया तो भविष्य में हमारे जाहेरस्थानों, सरनास्थलों, देशाउली में पूजा करने वाला कोई नहीं बचेगा। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद-30 के तहत ईसाई समुदाय को अल्पसंख्यक माना गया है।
ईसाई शैक्षणिक संस्थान खुद को माइनॉरिटी बताते हैं, लेकिन जब चुनाव लड़ने या सरकारी नौकरी लेने की बात आती है तो आदिवासी बन जाते हैं। उन्होंने कहा कि धर्मांतरित लोग खुशी से अपनी नई पहचान के साथ रहें तो हमें दिक्कत नहीं है। उसी से संबंधित लाभ लीजिए, लेकिन संविधान प्रदत हम आदिवासियों को दिए गए आरक्षण एवं अधिकारों का अतिक्रमण मत कीजिए।
पूर्व सीएम ने कहा कि चर्च वाले बयान पर हंगामा करने वालों को बताना चाहिए कि सीएनटी-एसपीटी एक्ट की कौन सी धारा में आदिवासियों की जमीन अल्पसंख्यकों को हस्तांतरित करने का अधिकार देती है। उन्होंने कहा कि धर्मांतरित लोग भले ही खुद को आदिवासी बताएं, लेकिन चर्च विशुद्ध रूप से अल्पसंख्यक धार्मिक स्थल हैं। बताना चाहिए कि किस जमीन पर बने हैं और किनकी अनुमति से।