logo

झारखंड से विदा लेने से पहले राज्यपाल ने कहा "लिफाफा" आने पर सरकार के कार्यों में आई तेजी

1427.jpg

द फॉलोअप डेस्क
हेमंत सोरेन ने अपने दो वर्षों के कार्यकाल में जितना काम नहीं किया था, जितना काम चुनाव आयोग का लिफाफा आने के बाद किया। इससे झारखंड का भला हुआ है। यह बातें बुधवार को झारखंड से विदा लेने से पहले राजभवन में राज्यपाल रमेश बैस ने पत्रकारों से कही। उन्होंने मुख्यमंत्री की सदस्यता को लेकर चुनाव आयोग के भेजे गए लिफाफे के संबंध में कहा कि उन्हें स्पष्ट कह दिया था कि वह निश्चिंत होकर अपना काम करें। मगर फिर भी कोई अपनी छांव से डरे तो मैं क्या करूं। राज्यपाल ने कहा कि झारखंड आने के बाद वह यहां जिस गति से विकास कराना चाहते थे, नहीं करा पाए। मंत्री और अधिकारियों के संबंध में कहा कि विजन अगर सही होता तो झारखंड बीमारू हीं विकासशील प्रदेश होता।

हेमंत बहुत अच्छे लीडर
राज्यपाल ने एक सवाल का जवाब देते हुए सीएम हेमंत सोरेन की प्रशंसा भी की। उन्होंने कहा कि हेमंत सोरेन बहुत अच्छे लीडर हैं। वे इतनी कम उम्र में मुख्यमंत्री बने हैं। इसलिए वे ऐसा काम कर सकते हैं जो लैंड मार्क साबित हो सकता है। राज्यपाल ने यह भी कहा कि मैंने बीच-बीच में उन्हें कई सलाह दी। लेकिन पता नहीं उस पर अमल वो क्यों नहीं कर सके।

 

यहां कानून व्यवस्था ठीक नहीं
राज्यपाल ने कहा कि उन्हें यह मलाल रहा कि यहां कानून व्यवस्था की स्थिति ठीक नहीं है। कई बार अधिकारियों को बुलाकर आवश्यक दिशा निर्देश दिए, मगर स्थिति नहीं सुधरी। उन्होंने कहा कि बाहर से इन्वेस्टर तभी आएंगे जब राज्य में लॉ एंड ऑर्डर की स्थिति ठीक रहेगी। राज्यपाल ने कहा कि छत्तीसगढ़ की तर्ज पर बजट में हेल्थ, एजुकेशन, रोड जैसे कुछ प्रमुख सेक्टर पर फोकस कर काम करना होगा, तभी राज्य का अपेक्षित विकास होगा।


टीएसी की राशि केंद्र ने रोकी, अधिकारियों को परवाह नहीं
टीएसी पर सरकार के साथ हुए विवाद को लेकर राज्यपाल ने कहा कि केंद्र सरकार ने वर्ष 2020-21 और 2021-22 में 200 करोड़ रुपए से अधिक की राशि राज्य सरकार को दी थी। मगर समीक्षा के दौरान पाया कि उसमें एक रुपया भी खर्च नहीं हुआ। जिसकी वजह से केंद्र सरकार ने 2022-23 में राशि देने पर रोक लगा दी। इसके बावजूद राज्य के अधिकारियों को इसकी परवाह नहीं है।

 

1932 खतियान से कई जिलों में होगी भारी समस्या
1932 के खतियान पर बात करते हुए राज्यपाल ने कहा कि हाईकोर्ट के फैसले के बाद भी सरकार क्यों जबरदस्ती करना चाहती है यह समझ में नहीं आया। अगर 1932 का खतियान स्थानीयता का आधार माना जाएगा तो इससे कई जिलों में भारी समस्या होगी। ऐसे में इस मामले में सही से निर्णय लेना राज्य हित में होगा।