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पर्यावरण मेला-2023 : आज के युग में आदिवासी ही प्रकृति के हैं सच्चे संरक्षक- रामेश्वर उरांव

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द फॉलोअप डेस्क
मेरा रांची से 1963-64 से नाता रहा है। उस समय से जून के महीने में भी रात में कंबल ओढ़ना पड़ता था। तब रांची के घरों एवं कार्यालयों में पंखा का कोई कंसेप्ट नहीं था। पहले घने जंगल थे, तालाब सरोवर की बहुलता थी। आजकल ये दोनो ही रांची में अपना अस्तित्व खो चुके हैं। आज फरवरी में ही गर्मी का आभास हो रहा है, धूप कड़वी लग रही है। यह परिस्थिति मानव निर्मित है। यह बातें मोराबादी मैदान में पर्यावरण मेला-2023 में बतौर मुख्य अतिथि झारखंड के वित्त मंत्री डॉ. रामेश्वर उरांव ने कही। उन्होंने  कहा कि मौसम की अनियमितता के कारण फसलों की उपज में प्रतिकूल असर पड़ा है। जिसके कारण मानव के सामने खाद्यान्न संकट खड़ा हो जाएगा। हमें प्रकृति से छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए। पहले के ऋषिमुनि आदि भी प्रकृति की उपासना एवं संरक्षण करते थे। आज के युग में आदिवासी ही प्रकृति के सच्चे संरक्षक है। वे जंगलों को काटते नहीं है, बल्कि उन्हें खेती के उद्देश्य से केवल साफ करते है। ऐसे आयोजनों से ही लोगों में प्रकृति के प्रति रूचि बढ़ेगी और वे पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक होंगे। इससे पहले मेले का उद्घाटन झारखंड हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति डॉ. एसएन पाठक, झारखंड सरकार के वित्त मंत्री रामेश्वर उरांव, विधायक सरयू राय व सीपी सिंह, सीसीएल के सीएमडी पीएम प्रसाद ने संयुक्त रूप से किया। मेले में लगभग 15 हजार लोगों की भीड़ थी। मेले की दुकानों में काफी खरीदारी हुई। लगभग 40 लाख का कारोबार हुआ है।

… तो प्रधानमंत्री भी रह गए आश्चर्यचकित

मेले के संरक्षक सरयू राय ने बताया कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में पहल उस समय आरंभ हुआ जब पहली बार वर्ष 2004 में पहली बार लोकसभा चुनाव के समय हमलोग दामोदर नदी के किनारे आस-पास के इलाकों में घूम कर चुनाव प्रचार कर रहे थे। तब देखा कि दामोदर नदी की दशा अत्यंत दयनीय थी। नदी में पानी कम और छाई ज्यादा था। डीवीसी एवं अन्य औद्योगिक इकाईयों का कचरा दामोदर नदी में सीधे गिर रहा था। तब हमने नदी को औद्योगिक प्रदूषण से मुक्त करने को ठाना और इसके लिए जन-जागरूकता अभियान चलाया। नदी के उद्गम स्थल से लेकर डीवीसी के मुख्यालय, कोलकाता तक धरना-प्रदर्शन किया, संबंधित संस्थानों, अधिकारियों को ज्ञापन सौंपा। जिसमें युगांतर भारती सहित कई अन्य स्वयंसेवी संस्थायें हमलोगों का सहयोग किया। दामोदर नद, गंगा नदी से भी अधिक पुरानी है। नदी को साफ करने के लिए कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं करना है। नदी प्रत्येक मानसून में स्वतः साफ हो जाती है। बाकी के 7-8 महिनों में नदी को हमलोग ही गंदा करते है। वर्ष 2017 में जब मैंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की तो उन्होंने कहा कि गंगा नदी को प्रदूषण मुक्त करने के उद्देश्य से नमामि गंगा एवं अन्य कई कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। जिसमें हजारों करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं। इस पर मैंने कहा कि हमने तो एक रुपए खर्च किए बिना ही दामोदर नदी को औद्योगिक प्रदूषण से लगभग मुक्त कर लिया है। नदी एवं नद को साफ करने के लिए पैसे की आवश्यकता नहीं है। यह सुनकर तो प्रधानमंत्री आश्चर्यचकित रह गए। हमें नदी को गंदा करनेवाले तत्वों को रोकना होगा, जिससे नदी का प्रदूषण नियंत्रित रहेगा। आज दामोदर औद्योगिक प्रदूषण से लगभग 90 प्रतिशत से अधिक साफ हो चुका है। आज नदियों एवं जलाशयों के लिए नगरीय प्रदूषण एक बहुत बड़ी चुनौती के रूप में सामने आ रही है। जल-मल एवं सिवरेज का गंदा पानी बिना साफ किये हुए नदियों, जलाशयों में सीधे गिर रहा है और पानी को अत्यधिक गंदा कर रहा है। हालांकि, राज्य के लिए यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि भारत सरकार ने रामगढ़, फूसरो और धनबाद के तीन स्थानों पर तीन सिवरेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने पर अपनी स्वीकृति दे दी है। सिवरेज ट्रीटमेंट प्लांट लगने के बाद नदियों में औद्योगिक प्रदूषण के साथ नगरीय प्रदूषण पर भी अंकुश लग जाएगा।

कोलयरी क्षेत्र में नियम का नहीं हो रहा पालन
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि विधायक सीपी सिंह ने कहा कि पहले जब हम सुबह धनबाद, रामगढ़ जैसे कोलयरी क्षेत्र में जाते थे तो शाम से पहले ही ऐसा लगता था कि हम कोयला से नहाये हुए है। कोयला के कण वायुमंडल में इस कदर मिले रहते थे कि हमारी सांसों में यह घुल जाते थे। आज भी लगभग यही स्थिति कोलयरी क्षेत्र की है। भारत सरकार का नियम है कि कोलयरी क्षेत्र में पानी का फौव्वारा प्रतिदिन सुबह-शाम छिड़का जाय, लेकिन यह नहीं हो रहा है यह नियम केवल फाईलों तक ही सीमित है। कोलयरी क्षेत्र के लोग स्वास्थ्य संबंधी एवं पर्यावरणीय समस्याओं का सामना कर रहे है। पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड जैसी संस्थान आज कल पैसा उगाही का केंद्र बना हुआ है।

मानवीय हस्तक्षेप के कारण ऋतु चक्र बिगड़ गया
झारखंड विकास आयुक्त अरूण सिंह ने कहा कि पर्यावरण पर मानवीय हस्तक्षेप के कारण ऋतु चक्र बिगड़ गया है। जिसके कारण जोशीमठ, उत्तराखंड, केदारनाथ जैसी त्रासदी सामने आ रही है। ओजोन परत का क्षय हो रहा है, कैंसर जैसी गंभीर बिमारीयां में काफी तेजी आई है। संसार को असमय ही अनावृष्टि तो कभी अतिवृष्टि का सामना करना पड़ रहा है। ग्लेशियर पिघल रहे है, समुद्र का पानी बढ़ रहा है।

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