जामताड़ा
जामताड़ा सदर अस्पताल में स्थापित ऑक्सीजन प्लांट पांच वर्षों बाद भी पूरी तरह चालू नहीं हो सका है। कोरोना काल में गंभीर मरीजों को निर्बाध ऑक्सीजन उपलब्ध कराने और अस्पताल को सिलेंडरों पर आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से पीएम केयर फंड के तहत इस प्लांट की स्थापना की गई थी। लेकिन प्रशासनिक उदासीनता के कारण करीब 15 लाख रुपए की लागत से बना यह प्लांट आज सफेद हाथी साबित हो रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, 100 से 250 एलपीएम (लीटर प्रति मिनट) क्षमता वाले इस प्लांट को पाइपलाइन और वायरिंग के माध्यम से सीधे बेड तक ऑक्सीजन आपूर्ति करने के लिए डिज़ाइन किया गया था। यदि यह प्लांट पूरी क्षमता से काम करता, तो जिले की 9 लाख से अधिक आबादी को इसका सीधा लाभ मिलता। इससे न केवल गंभीर मरीजों को दूसरे बड़े अस्पतालों में रेफर करने के मामलों में कमी आती, बल्कि समय पर इलाज मिलने से उनकी जान बचने की संभावना भी कई गुना बढ़ जाती।

रोजाना 40 मरीज भर्ती, व्यवस्था कंसंट्रेटर के भरोसे
सदर अस्पताल के आंकड़ों पर नज़र डालें तो स्थिति की गंभीरता साफ समझ आती है: अस्पताल में प्रतिवर्ष करीब 4,200 मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं, जिनमें से लगभग 1,500 गंभीर मरीजों को भर्ती करना पड़ता है। ओपीडी में रोजाना लगभग 200 मरीज आते हैं, जिनमें से करीब 40 गंभीर मरीजों को इमरजेंसी में ऑक्सीजन देकर भर्ती किया जाता है। प्रसव (डिलीवरी) और सिजेरियन ऑपरेशन के दौरान भी लगातार ऑक्सीजन की भारी जरूरत होती है। इस भारी मांग के बावजूद, अस्पताल प्रशासन वर्तमान में केवल ऑक्सीजन कंसंट्रेटर (करीब 200 यूनिट) के सहारे जैसे-तैसे व्यवस्था चला रहा है, जो आपातकालीन और अत्यंत गंभीर स्थितियों में पर्याप्त नहीं हैं।

तकनीकी और प्रशासनिक पेंच में फंसा प्रोजेक्ट
अस्पताल प्रशासन के अनुसार, इस बहुउपयोगी प्लांट के बंद रहने की मुख्य वजह प्रशासनिक और तकनीकी तालमेल की कमी है। संबंधित निर्माण कंपनी के साथ अब तक एमओयू (Memorandum of Understanding) नहीं हो सका है। इसके अलावा, प्लांट के संचालन के लिए आवश्यक प्रशिक्षित तकनीशियन (टेक्नीशियन) और नियमित देखरेख की व्यवस्था भी अस्पताल के पास उपलब्ध नहीं है।
