रांची
झारखंड में कोयला खनन के बाद खाली पड़ी लगभग 45,000 हेक्टेयर भूमि के दोबारा इस्तेमाल की दिशा में बड़ा रोडमैप तैयार किया जा रहा है। यह पहल न सिर्फ राज्य की आर्थिक तस्वीर बदल सकती है, बल्कि भारत के नेट-ज़ीरो कार्बन लक्ष्य को हासिल करने में भी अहम भूमिका निभाएगी।
दिल्ली स्थित एक शोध संस्थान द्वारा किए गए अध्ययन में बताया गया है कि राज्य की बंद और गैर-संचालित कोयला खदानों से 11,000 हेक्टेयर से अधिक भूमि तुरंत उपलब्ध है। वहीं, अगले 5 से 10 वर्षों में कुल मिलाकर करीब 45,000 हेक्टेयर खनन भूमि के पुनः उपयोग की योजना बनाई जा सकती है।

ग्रीन एनर्जी और इंडस्ट्री के लिए बड़ा मौका
अध्ययन के अनुसार, इस भूमि का उपयोग नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं, हरित विनिर्माण, लॉजिस्टिक्स हब और अन्य औद्योगिक गतिविधियों के लिए किया जा सकता है। इससे कोयला-निर्भर जिलों में आर्थिक विविधीकरण को बढ़ावा मिलेगा और स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि झारखंड के जिला खनिज फाउंडेशन (DMF) में 16,977 करोड़ रुपये की राशि जमा है। इस फंड का उपयोग आजीविका विविधीकरण, कौशल विकास और कल्याणकारी योजनाओं के जरिए कोयला क्षेत्रों में संतुलित परिवर्तन के लिए किया जा सकता है।
60 प्रतिशत खदानें अंतिम चरण में
अध्ययन में बताया गया है कि खनन योग्य भंडार के घटने और आर्थिक व्यवहार्यता कम होने के कारण राज्य की करीब 60 प्रतिशत कोयला खदानें अपने अंतिम खनन चरण की ओर बढ़ रही हैं। ऐसे में समय रहते योजना बनाकर इन खदानों से जुड़ी भूमि का पुनरुपयोग किया गया, तो धनबाद, बोकारो और रामगढ़ जैसे जिलों में बड़े भू-क्षेत्र विकास के लिए उपलब्ध हो सकते हैं।
हरित निवेश और रोजगार का नया अध्याय
रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि यदि कोयला संक्रमण को रणनीतिक ढंग से संभाला गया, तो यह झारखंड के लिए ग्रीन इन्वेस्टमेंट और रोजगार सृजन का एक बड़ा अवसर साबित हो सकता है, जिससे राज्य की अर्थव्यवस्था को नई दिशा मिलेगी।
