द फॉलोअप डेस्क
वरिष्ठ पत्रकार, विचारक और इंदिरा गांधी कला केंद्र दिल्ली के अध्यक्ष रामबहादुर राय आज शाम चार बजे रांची के वरिष्ठ पत्रकार अमरेंद्र कुमार की पुस्तक नीले आकाश का सच, का लोकार्पण करेंगे। स्पीकर हॉल कंस्टीट्युशन क्लब दिल्ली में आयोजित लोकार्पण समारोह में वरिष्ठ पत्रकार प्रो केजी सुरेश और लेखक एवं अधिवक्ता विराग गुप्ता विशेष रूप से मौजूद रहेंगे। अमरेंद्र कुमार की पत्रकारिता की शुरुआत पटना से हुई। वहां वह सहारा और आज से जुड़ कर कई वर्षों तक पत्रकारिता की। फिर वह 2002 में रांची आ गए और दैनिक हिन्दुस्तान से जुड़ कर पत्रकारिता की विधा को आगे बढ़ाते रहे। फिलहाल वह दैनिक भास्कर रांची में कार्यरत हैं। अमरेंद्र कुमार की पुस्तक नीले आकाश का सच झारखंड और बिहार की राजनीति और प्रशासनिक संस्कृति पर केंद्रित है। रिपोर्टिंग के दौरान प्राप्त अनुभवों पर आधारित है।

"नीले आकाश का सच" एक ऐसी पुस्तक है, जो बिहार और झारखंड की राजनीति, सत्ता, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक तंत्र की जटिल सच्चाइयों को उजागर करती है। यह किताब सिर्फ घटनाओं का दस्तावेज नहीं, बल्कि एक ऐसी पत्रकारिक यात्रा है, जो बताती है कि सत्ता के गलियारों में कैसे फैसले होते हैं, किस तरह घोटालों की गूंज लोकतंत्र के स्तंभों को हिलाती है और कैसे जनता की उम्मीदें राजनीतिक समीकरणों में गुम हो जाती हैं। किताब की शुरुआत "बिहार विभाजन और झारखंड गठन" से होती है, जिसमें झारखंड आंदोलन की पृष्ठभूमि, संघर्ष और अंततः राज्य निर्माण की राजनीतिक खींचतान को विस्तार से बताया गया है। यह अध्याय दिखाता है कि कैसे राजनीतिक समीकरणों के चलते वरिष्ठ नेता कड़िया मुंडा मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँचते-पहुँचते रह गए और बाबूलाल मरांडी झारखंड के पहले मुख्यमंत्री बन गए।
दूसरा अध्याय "पशुपालन घोटाला और लालू प्रसाद" बिहार की राजनीति के सबसे बड़े भ्रष्टाचार की कहानी कहता है। इसमें बताया गया है कि किस तरह करोड़ों रुपये सरकारी खजाने से फर्जी बिलों और घोटालों के जरिये निकाले गए और किस तरह इस घोटाला से बिहार की राजनीति का चेहरा बदल गया।

तीसरा अध्याय "लालू प्रसाद और राबड़ी देवी के रोचक किस्से" बिहार की सत्ता के दिलचस्प और कभी-कभी हास्यपूर्ण पहलुओं को सामने लाता है। इसमें सत्ता के भीतर के कई ऐसे किस्से हैं जो राजनीति के मानवीय और नाटकीय दोनों रूपों को दिखाते हैं।
चौथा अध्याय "सचिवालय का सच और रिपोर्टिंग की यात्रा" लेखक की पत्रकारिक दृष्टि का परिचायक है। यह अध्याय सरकारी फाइलों, प्रशासनिक गड़बड़ियों और जमीनी रिपोर्टिंग के अनुभवों से भरा है।
इसके बाद पांचवां अध्याय में "बिहार के घोटालों से नहीं सीख लिया झारखंड ने "में बताया गया है कि कैसे झारखंड ने बिहार की गलतियों को दोहराया। नए राज्य में भ्रष्टाचार, गुप्त फंड के दुरुपयोग और सत्ता की राजनीति ने जनता की उम्मीदों को धूमिल कर दिया।
"गुप्त फंड का गुप्त उपयोग", "खान और उद्योग", और "शराब पर खेल" जैसे अध्याय सत्ता और व्यवसाय के गठजोड़ को उजागर करते हैं। ये दिखाते हैं कि किस तरह प्राकृतिक संसाधनों और योजनाओं को निजी हितों के लिए इस्तेमाल किया गया।
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"पानी के पाइप में बह रहा भ्रष्टाचार" अध्याय में जलापूर्ति योजनाओं में हुए घोटालों का खुलासा किया गया है, जबकि "रघुवर दास, मैनहर्ट और राज्यपाल का संयोग" सत्ता के ऊपरी स्तर पर चल रही अदृश्य राजनीतिक ताकतों का चित्रण करता है।
अंतिम 11 वां अध्याय "द गार्डियंस बाबूलाल से हेमंत तक" झारखंड की राजनीतिक यात्रा को समेटता है। इसमें राज्य के मुख्यमंत्रियों की भूमिका, उनके फैसले, और विकास बनाम राजनीति की जंग का सटीक विश्लेषण है।
कुल मिलाकर, "नीले आकाश का सच" बिहार और झारखंड की राजनीति की मिट्टी से निकली वह कहानी है जिसमें सत्ता की सच्चाई, घोटालों की गंध, और उम्मीदों के नीले आकाश की तलाश एक साथ चलती है। यह किताब पत्रकारिता, राजनीति और समाज के उन अदृश्य सूत्रों को जोड़ती है जिनसे भारत के लोकतंत्र की असल तस्वीर उभरती है।
दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद लालू प्रसाद देश का प्रधानमंत्री बनना चाहते थे। उन्होंने इसके लिए अपनी रणनीति तैयार कर शतरंज की बिसात भी बिछा रखा था। लेकिन प्रधानमंत्री नहीं बन सके। इस प्रकरण के रोचक तथ्यों की जानकारी मिलेगी इस पुस्तक में।
इस पुस्तक में आपको जानकारी मिलेगी कि एचडी देवगौड़ा को प्रधानमंत्री पद से हटाकर इंद्र कुमार गुजराल को पीएम बनाने की क्यों बनी थी रणनीति ? इसके पीछे की क्या थी कहानी ?
क्या आप जानना चाहते हैं कि लालू प्रसाद ने चारा घोटाला में शामिल माफिया के खिलाफ एफआईआर का आदेश देने से कैसे इंकार कर दिया था? फिर कैसे और किस अधिकारी के दबाव में उन्हें आदेश देना पड़ा? तो इन बातों की जानकारी आपको इस पुस्तक में मिलेगी।
इस पुस्तक से आप जान पाएंगे कि अपनी लाश पर झारखंड राज्य बनने देने की बात करने वाले लालू प्रसाद क्यों और कैसे अलग झारखंड राज्य बनाने के लिए हो गए राजी ? कैसे कैसे चला खेल ? अलग झारखंड राज्य बनने को लेकर धुरी बने शिबू सोरेन को राजनीतिक दलों ने कैसे सत्ता से रखा दूर, उनके साथ क्या हुआ छल और खेल, क्या चाहते थे उस समय शिबू सोरेन ?
इस पुस्तक में यह खुलासा किया गया है कि कैसे रातों रात कड़िया मुंडा को झारखंड का पहला मुख्यमंत्री बनाने के फैसला को बदला गया और बाबूलाल मरांडी झारखंड के सीएम बन गए? और क्या थी पीछे की कहानी ?

झारखंड पुलिस की गुप्त सेवा कोष के दुरुपयोग की रोचक और अनकही कहानियां तथा राज्यपाल व केंद्रीय गृहमंत्री के बीच गोपनीय पत्राचार की बातों की जानकारी है इस पुस्तक में।
झारखंड लोक सेवा आयोग के गठन और उसके द्वारा कई परीक्षा में की गई गड़बड़ी की अनकही बातें हैं इस पुस्तक में। इस पुस्तक में झारखंड के गठन होने की वर्ष 1912 से लेकर 2002 तक के दौरान के कई स्थिति परीस्थिति और घटनाओं का ऐसा उल्लेख मिलेगा जो आम जनों की जानकारी से परे है। राज्य गठन के समय शिबू सोरेन को कैसे सत्ता से बाहर रखने का खेल हुआ, इसकी भी रोचक जानकारी और राज्य गठन के पहले समारोह में कैसे राज्य बदली वह भी आपको जानने को मिलेगी।
