द फॉलोअप डेस्क
दक्षिण पूर्व रेलवे के चक्रधरपुर मंडल में इन दिनों रेल यात्रा यात्रियों के लिए किसी सजा से कम नहीं रह गई है। जिस हावड़ा-मुंबई मेन लाइन को 130 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार के लिए तैयार किया गया था, उसी ट्रैक पर ट्रेनें अब महज 25 किलोमीटर प्रति घंटे की औसत से रेंग रही हैं। एक्सप्रेस से लेकर मेमू तक, लगभग हर यात्री ट्रेन कई-कई घंटे की देरी से चल रही है और समयबद्धता पूरी तरह पटरी से उतर चुकी है। इसमें सबसे चिंताजनक स्थिति टाटानगर के आसपास देखने को मिलती है। जहां एक ओर ट्रेनें अपने तय समय पर चक्रधरपुर, कांड्रा, गम्हरिया, चांडिल या आदित्यपुर तक पहुंच जाती हैं। वहीं, दूसरी ओर खड़गपुर, चाकुलिया, धालभूमगढ़, घाटशिला, राखामाइंस, आसनबानी, सालगाझुड़ी या फिर गोविंदपुर तक तो ट्रेनें आसानी से पहुंच जाती है। लेकिन इसके बाद ट्रेनें टाटानगर स्टेशन से कुछ किलोमीटर पहले आउटर सिग्नल पर घंटों रोक दी जाती हैं। इतना ही नहीं, इससे पहले ट्रेनों की चींटी जैसी रेंगने की चाल यात्रियों के लिए मुसीबत का सबब बन जाती है। वहीं यात्रियों का कहना है कि यह देरी तकनीकी कारणों से कम और मालगाड़ियों को प्राथमिकता देने की वजह से ज्यादा हो रही है। नतीजन, सैकड़ों यात्री बिना किसी स्पष्ट सूचना के डिब्बों में फंसे रहते हैं और इंतजार उनकी मजबूरी बन जाता है। दरअसल, ट्रेनों की इस लेटलतीफी का मुख्य कारण चक्रधरपुर मंडल में बिगड़ा संतुलन है, जहां मालगाड़ियों का दबदबा यात्री ट्रेनों पर भारी पड़ रहा है।

कोयला और लौह अयस्क की ढुलाई से मिलने वाले राजस्व ने परिचालन की प्राथमिकता तय कर दी है। टाटा स्टील, रुंगटा और नोवोको विस्टास जैसी औद्योगिक इकाइयों से जुड़ी मालगाड़ियां लगातार ग्रीन सिग्नल पर आगे बढ़ती हैं, जबकि टाटानगर से गुजरने वाली बड़ी संख्या में यात्री ट्रेनें आउटर पर खड़ी-खड़ी समय गंवाती रहती हैं। इस अव्यवस्था का सबसे गहरा असर उन हजारों दैनिक यात्रियों पर पड़ रहा है, जो चांडिल, कांड्रा, घाटशिला, गिद्धनी, झाड़ग्राम और खड़गपुर जैसे इलाकों से रोज जमशेदपुर काम करने आते हैं। ट्रेन की देरी अब सिर्फ असुविधा नहीं, बल्कि उनकी रोजी-रोटी पर सीधा प्रहार बन गई है। समय पर काम नहीं पहुंच पाने के कारण कई मजदूरों की दिहाड़ी कट रही है, तो कुछ के सामने नौकरी पर संकट खड़ा हो गया है। एक यात्री पिंटू प्रमाणिक का आरोप है कि रेलवे ने मुनाफे की दौड़ में यात्री सुविधाओं को पूरी तरह दरकिनार कर दिया है। उनके मुताबिक, दर्जनों यात्री ट्रेनों की बलि देकर रेलवे मालगाड़ियों के जरिए खजाना भरने में जुटा है। लगातार बिगड़ती समयबद्धता ने दक्षिण पूर्व रेलवे की कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इधर, जमशेदपुर के सियासत में इन दिनों ट्रेनों को लेटलतिफी का मुद्दा केंद्र में आ गया है। जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय ने रेलवे की कार्यप्रणाली पर तीखा हमला बोलते हुए इसे राजशाही और पीड़क मानसिकता करार दिया है। इसे लेकर उन्होंने 7 अप्रैल को टाटानगर जंक्शन पर महाधरना देने का ऐलान किया है और इसे जन-आंदोलन का रूप देने की तैयारी शुरू कर दी है।

इसी बीच रविवार को चक्रधरपुर मंडल के रेलवे के सीनियर अधिकारियों ने विधायक सरयू राय के साथ बैठक कर स्थिति को संभालने की कोशिश भी की है। इस दौरान अधिकारियों ने परिचालन में सुधार और लेटलतिफी कम करने के लिए जरूरी कदम उठाने का भरोसा दिया है। दूसरी ओर, इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक सरगर्मी भी तेज हो गई है। एक तरफ धरने के जरिए दबाव बनाने की तैयारी है, तो दूसरी तरफ रेलवे स्तर पर सुधार के दावे किए जा रहे हैं। ऐसे में टाटानगर स्टेशन अब सिर्फ एक रेलवे जंक्शन नहीं, बल्कि एक सियासी मंच बनता नजर आ रहा है। इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे बड़ा सवाल अब भी कायम है कि जब चांडिल या घाटशिला से टाटानगर की दूरी महज 30 मिनट की है, तो ट्रेनों को 3 से 5 घंटे क्यों लग रहे हैं? क्या यह सिर्फ परिचालन की लापरवाही है या फिर एक ऐसी नीति, जिसमें यात्रियों से ज्यादा प्राथमिकता मुनाफे को दी जा रही है? फिलहाल, यात्रियों का गुस्सा लगातार बढ़ रहा है और इसका असर अब सड़कों तक दिखने लगा है। ऐसे में चक्रधरपुर मंडल में पटरी पर दौड़ती ट्रेनें अब सिर्फ यात्रियों को मंजिल तक नहीं पहुंचा रहीं, बल्कि एक ऐसे सिस्टम की तस्वीर भी पेश कर रही हैं, जहां इंतजार सिर्फ ट्रेन का नहीं, बल्कि जवाबदेही का भी है।