द फॉलोअप डेस्क
देश जहां 5G और डिजिटल क्रांति की बात कर रहा है, वहीं झारखंड का चतरा जिला आज भी बुनियादी मोबाइल नेटवर्क के लिए जूझ रहा है। यहां के कई गांवों में हालात ऐसे हैं कि एक साधारण फोन कॉल करने के लिए लोगों को पेड़ों और पहाड़ों पर चढ़ना पड़ता है।चतरा जिले के कुंदा प्रखंड के 78 गांवों में से करीब 30 गांव आज भी ‘डिजिटल ब्लैकआउट’ का सामना कर रहे हैं। वहीं प्रतापपुर और लावालौंग प्रखंड के कई इलाकों में मोबाइल नेटवर्क लगभग न के बराबर है। लोगों का कहना है कि जमीन पर सिग्नल मिलना मुश्किल है, इसलिए उन्हें ऊंचाई का सहारा लेना पड़ता है। ग्रामीण बताते हैं कि परिजनों से बात करनी हो या किसी आपात स्थिति में मदद मांगनी हो, उन्हें अपनी जान जोखिम में डालकर पेड़ों पर चढ़ना पड़ता है। कई बार घंटों तक ऊंचाई पर खड़े रहकर सिग्नल का इंतजार करना पड़ता है। इस नेटवर्क समस्या का सबसे ज्यादा असर शिक्षा व्यवस्था पर पड़ा है।

प्रतापपुर प्रखंड के बामी गांव स्थित एक सरकारी स्कूल में डिजिटल शिक्षा पूरी तरह ठप है। यहां के सहायक शिक्षक को ऑनलाइन हाजिरी बनाने के लिए रोजाना पहाड़ पर जाना पड़ता है। अगर सिग्नल मिल गया तो उपस्थिति दर्ज होती है, नहीं तो गैरहाजिर माना जाता है। वहीं स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति और भी गंभीर है। गांव में किसी के बीमार पड़ने पर एंबुलेंस बुलाना बड़ी चुनौती बन जाता है। फोन करने के लिए लोगों को ऊंचाई वाले स्थानों पर जाना पड़ता है, जिससे समय पर इलाज होना मुश्किल हो जाता है। इन सब के बीच हैरानी की बात यह है कि इन इलाकों में BSNL के टावर लगे होने के बावजूद नेटवर्क की स्थिति बदहाल है। तकनीकी खामियों और कमजोर नेटवर्क बैंड के कारण इन टावरों का कोई खास फायदा लोगों को नहीं मिल पा रहा है। अब बड़ा सवाल यह है कि जब देश डिजिटल इंडिया की ओर तेजी से बढ़ रहा है, तब चतरा के ये गांव कब इस विकास से जुड़ पाएंगे, कब तक यहां के लोग नेटवर्क के लिए पेड़ों और पहाड़ों का सहारा लेते रहेंगे।
