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स्वर्णरेखा नदी में मछलियों की सामूहिक मौत, पर्यावरणीय संकट पर विधायक सरयू राय ने उठाए सवाल 

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द फॉलोअप डेस्क 

स्वर्णरेखा नदी में बड़े पैमाने पर मछलियों की सामूहिक मौत ने पर्यावरणीय खतरे की घंटी बजा दी है। साथ ही प्रशासनिक जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिये हैं। इसे लेकर जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय ने गुरुवार को भुईंयाडीह स्थित बाबूडीह और लालभट्ठा स्वर्णरेखा नदी घाट का दौरा किया। इस दौरान सरयू राय ने मामले में उच्चस्तरीय जांच की मांग की। उन्होंने कहा कि 31 मार्च को हुए भीषण जल प्रदूषण के बाद तीन दिन बीत गये, हालात बेहद गंभीर हैं और नदी किनारे अब भी बड़ी संख्या में मरी हुई मछलियां पड़ी हैं। निरीक्षण के दौरान नदी घाटों पर सड़ती मछलियों में कीड़े लग चुके थे और पूरे इलाके में तीखी दुर्गंध फैली हुई थी। नदी का पानी किनारों पर काले रंग में बदल चुका है, जो प्रदूषण की भयावह स्थिति को दर्शाता है। राय ने आशंका जताई कि रिहायशी इलाकों और औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला दूषित बहिस्राव ही इस घटना की मुख्य वजह हो सकता है, हालांकि इसकी पुष्टि जांच के बाद ही संभव है।

उन्होंने इस मामले में तीन प्रमुख संस्थाओं, जिला प्रशासन, झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और जमशेदपुर अधिसूचित क्षेत्र समिति की भूमिका पर सवाल उठाये। राय ने कहा कि इन संस्थाओं को अब तक उठाये गये कदमों की सार्वजनिक जानकारी देनी चाहिए। राय ने विशेष रूप से प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की कार्यप्रणाली पर गंभीर आरोप लगाये। उन्होंने कहा कि बोर्ड में अधिकारियों और वैज्ञानिकों की भारी कमी है और उसका ध्यान प्रदूषण नियंत्रण के बजाय उद्योगों को अनुमति देने तक सीमित है। उन्होंने बताया कि उद्योगों में स्थापित किये जाने वाले ऑनलाइन कंटीन्यूअस मॉनिटरिंग सिस्टम के बावजूद प्रदूषण से जुड़े जरूरी आंकड़े सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं। उन्होंने दावा किया कि टाटा स्टील लिमिटेड के बहिस्राव से जुड़े कई महत्वपूर्ण डेटा केंद्रीय स्तर पर भी अधूरे हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, बीओडी (बायलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड) और सीओडी (केमिकल ऑक्सीजन डिमांड) जैसे मानक तय सीमा से कई गुना अधिक पाए गए हैं।

उदाहरण के तौर पर, जहां बीओडी की अधिकतम सीमा 30 mg/L है, वहीं यह 439.6 mg/L दर्ज किया गया। इसी तरह सीओडी भी निर्धारित 250 mg/L के मुकाबले 880.8 mg/L पाया गया। सरयू राय ने यह भी कहा कि अमोनिया, तेल-ग्रीस और सायनाइड जैसे खतरनाक तत्वों के लिए आवश्यक सेंसर और अलर्ट सिस्टम तक स्थापित नहीं किए गए हैं, जिससे प्रदूषण की निगरानी और नियंत्रण दोनों ही प्रभावित हो रहे हैं। उन्होंने पूर्वी सिंहभूम के उपायुक्त से मांग की है कि इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाये और एक तय समय सीमा के भीतर विस्तृत रिपोर्ट सार्वजनिक की जाये। साथ ही, दोषी संस्थाओं और उद्योगों की जवाबदेही तय कर सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जाये।

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