द फॉलोअप डेस्क
17 अक्टूबर 2024, यह तारीख शायद सरकारी फाइलों में धुंधली हो चुकी हो, लेकिन मकरंडा पंचायत के नवाडीह गांव की नंदी सुरीन के लिए आज भी गहरे दर्द की तरह जिंदा है। उसी दिन नक्सलियों द्वारा बिछाए गए आईईडी विस्फोट में उसके पति सुनील सुरीन की मौत हो गई थी। घटना के बाद सरकारी आश्वासन मिले, मुआवजे और नौकरी तक की बात हुई, संवेदनाएं दर्ज की गई। लेकिन, समय बीतते-बीतते उस वादे और हक के बीच एक लंबा फासला खड़ा हो गया। आज उस घटना को 13 महीने से ज्यादा का समय बीत चुका है। लेकिन, सुनील के परिवार तक न कोई मदद पहुंची, न मुआवजे की राशि और न ही नौकरी। नंदी सुरीन इन सबको लेकर पिछले एक साल से मनोहरपुर प्रखंड कार्यालय का चक्कर लगा रही है। कभी सुबह पहुंचती है, कभी लाइन में घंटों खड़ी रहती है, कभी फॉर्म भरती है, कभी दस्तावेज जमा करती है। लेकिन हर बार लौटने पर उसके हाथ सिर्फ निराशा लगती है।

यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती। दरअसल, नंदी सुरीन को मिलने वाला मुआवजा इसलिए रुका है, क्योंकि नंदी और उसके परिवार का आधार कार्ड अब तक नहीं बन पाया है। वह बताती है कि प्रखंड कार्यालय स्थित आधार केंद्र में उसका दो बार बायोमेट्रिक और फोटो लिया गया। उसे आधार की अस्थायी पावती भी मिल गई, उसी पावती पर उसका बैंक खाता खुल गया, वोटर कार्ड भी बन गया। लेकिन आधार कार्ड, जो सरकारी योजनाओं का दरवाजा खोलता है अब भी उसे नहीं मिला है। जब भी पूछने जाती है, जवाब वही सुनने को मिलता है अभी नहीं बना है, बाद में आइए।
बता दें कि सुनील की मौत के बाद नंदी पर चार बच्चों की जिम्मेदारी आ गई है। उसकी आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर है कि उसे अपने दो बेटों को मायके भेजना पड़ा। घर पर सिर्फ वह और उसकी दो बेटियां हैं। उनका गुजारा पहले जंगल में पत्ता और लकड़ी बेचकर होता था, लेकिन सुरक्षा कारणों से यह रास्ता भी बंद हो चुका है। उनके पास राशन कार्ड भी नहीं है, इसलिए सरकारी खाद्यान्न भी नहीं मिल पा रहा है। हाल ही में उसे यह बताया गया कि आधार कार्ड बनाने से पहले बच्चों और परिवार के जन्म प्रमाणपत्र बनेंगे। पर यह प्रक्रिया कब शुरू होगी और कब पूरी होगी, इसका जवाब किसी के पास नहीं। नंदी कहती है कि अब मैं थक चुकी हूं। हर बार उम्मीद लेकर जाती हूं, लेकिन वहीं से निराश होकर लौट आती हूं। लगता है जैसे मेरे पति की मौत सिर्फ खबर बनकर रह गई थी।
ऐसे में यह मामला सिर्फ एक परिवार की तकलीफ नहीं, बल्कि उस सिस्टम का आईना भी है, जहां प्रक्रिया कभी-कभी संवेदनशीलता पर भारी पड़ जाती है। सवाल यह है कि क्या एक साल से ज्यादा का इंतजार भी पर्याप्त नहीं? क्या दस्तावेजों की कमी में मुआवजा रोक देना न्याय कहलाता है? और आखिर वह दिन कब आयेगा, जब गरीब को अपने अधिकार के लिए दर-दर भटकना नहीं पड़ेगा? सुनील सुरीन अब इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन, उनका परिवार आज भी इंतजार में है, एक आधार कार्ड का, एक हस्ताक्षर का, और उस वादे का जो उनके पति की मौत के बाद सरकार की ओर से किया गया था।