नंदलाल तुरी
पाकुड़ के राजापाड़ा स्थित राजबाड़ी के प्रसिद्ध नृत्य काली मंदिर में वर्षों से तांत्रिक विधि से पूजा अर्चना होती आ रही है। इस मंदिर का निर्माण राजा पृथ्वी चंद्र शाही ने सन 1737 ई. में कराया था। मंदिर के निर्माण के बाद मां काली के परम भक्त साधक बामाखेपा ने तीन दिनों तक यहां साधना की थी। मान्यता है कि इस मंदिर में जो भी भक्त सच्चे मन से कुछ मांगता है, उसकी मन्नत पूरी हो जाती है।
पुरोहित के अनुसार, प्रतिमा स्थापित करने के बाद मां काली के उग्र रूप को देखते हुए पुत्र रूप में गणेश भगवान की प्रतिमा स्थापित की गई। साथ ही, मंदिर के चारों ओर शिवलिंग भी स्थापित किए गए हैं। पुरोहित का कहना है कि बाबा बैद्यनाथ और बासुकीनाथ की तरह ही तारापीठ और नित्य मां काली का संबंध है। मंदिर में झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों से भी लोग पूजा अर्चना करने आते हैं। पुरोहित भरत मिश्रा ने बताया कि मंदिर निर्माण के बाद साधक बामाखेपा स्वयं पाकुड़ आए थे और उन्होंने तीन दिनों तक मां काली की साधना की। इस दौरान मां काली ने साधक को तारापीठ जाने की बात कही।
यह भी बताया जाता है कि पाकुड़ के राजा पृथ्वी चंद्र शाही को मां काली ने सपने में आदेश दिया कि राजबाड़ी के पीछे स्थित तालाब से एक शीला उठाकर उसे प्रतिमा के रूप में आकार दिया जाए। राजा को यह सपना इतना सच्चा लगा कि उन्होंने उसी सुबह एक व्यक्ति को दरबार में बुलाया, जो खुद को बनारस का मूर्तिकार बताता था। मूर्तिकार ने राजा को बताया कि तालाब में एक शीला है, जिसे मूर्ति का रूप देना है। राजा ने शीला निकलवाई और मूर्तिकार ने एक ही दिन में मां काली की प्रतिमा बना दी। यह कहा जाता है कि मूर्तिकार कोई और नहीं, बल्कि बाबा विश्वकर्मा स्वयं थे। तब से इस मंदिर में प्रतिदिन पूजा अर्चना होती आ रही है, विशेषकर शनिवार और मंगलवार के अलावा काली पूजा के दिन तांत्रिक विधि से विशेष पूजा अर्चना की जाती है।
