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पेसा कानून लागू करने में राज्य सरकार टालमटोल कर रही है: पूर्णिमा साहू

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द फॉलोअप डेस्क 
जमशेदपुर पूर्वी की विधायक पूर्णिमा साहू ने राज्य सरकार पर पेसा कानून लागू करने को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार पेसा कानून को लागू करने में टालमटोल की नीति अपना रही है। सरकार द्वारा विधानसभा में दिए गए उत्तर से यह स्पष्ट होता है दरअसल, विधायक पूर्णिमा साहू ने विधानसभा में पेसा कानून से संबंधित कई सवाल सरकार से पूछे थे। इन सवालों के जवाब में सरकार ने स्वीकार किया कि झारखंड में पेसा कानून लागू करने की सारी प्रक्रियाएं पूर्ण हो चुकी हैं। उन्होंने आगे कहा कि सारी प्रक्रियाएं पूर्ण हो चुकी इसके बावजूद सरकार इसे लागू करने को लेकर कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाई।
सरकार ने अपने उत्तर में कहा, "झारखंड पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) नियमावली, 2024 निर्माण की कार्रवाई प्रक्रियाधीन है।" इस उत्तर पर सवाल उठाते हुए पूर्णिमा साहू ने कहा, "सरकार ने यह नहीं बताया कि मामला कहां अटका हुआ है और कब तक पेसा कानून लागू किया जाएगा। यह स्पष्ट है कि सरकार विदेशी धर्म के प्रभाव में आकर झारखंड की रूढ़िवादी परंपरा को मानने वाले आदिवासियों को अधिकार देने वाला पेसा कानून लागू नहीं करना चाहती है।"
पूर्णिमा साहू ने सरकार से सवाल किए थे:
क्या यह सत्य है कि संविधान की पांचवी अनुसूची के अनुरूप पेसा कानून लागू होने से जनजातीय समाज को ग्राम सभा में अपनी परंपरा के अनुसार स्वशासन का अधिकार प्राप्त होगा?
क्या यह सत्य है कि जुलाई, 2023 में सरकार ने पेसा नियमावली का प्रारूप प्रकाशित कर आमजन से आपत्तियां एवं सुझाव आमंत्रित किए थे?
क्या यह सत्य है कि ट्राइबल एडवाइजरी कमिटी ने इन आपत्तियों एवं सुझावों पर विचार कर नियमावली के प्रारूप को अंतिम रूप दिया?
क्या यह सत्य है कि मार्च, 2024 में महाधिवक्ता झारखंड एवं विधि विभाग ने इस नियमावली को सुप्रीम कोर्ट एवं हाईकोर्ट के न्यायिक निर्देशों के अनुरूप मानते हुए अपनी सहमति दी?

इन सभी सवालों के जवाब में सरकार ने स्वीकार किया कि प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। लेकिन जब यह पूछा गया कि पेसा कानून को लागू करने में और कितना समय लगेगा, तो सरकार ने कोई स्पष्ट समय-सीमा नहीं बताई, न ही यह बताया कि कौन-कौन सी प्रक्रियाएं शेष हैं। विधायक पूर्णिमा साहू ने कहा कि सरकार का रवैया जनजातीय समाज के अधिकारों के प्रति संवेदनहीनता को दर्शाता है और इसकी मंशा पर गंभीर सवाल खड़े करता है।


 

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