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निशा उरांव के नेतृत्व में विभिन्न जनजातियों के प्रधानों ने राज्यपाल से की पेसा नियमावली में संशोधन की मांग

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द फॉलोअप डेस्क
रूढ़िजन्य आदिवासी समन्वय समिति का एक शिष्टमंडल आज लोक भवन में राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार से भेंट की। इस अवसर पर शिष्टमंडल में अखिल भारतीय राजस्व सेवा की अधिकारी निशा उरांव के नेतृत्व में अलग अलग जनजातियों के लगभग 40 प्रधान शामिल थे।  शिष्टमंडल ने पेसा नियमावली–2025 के विभिन्न प्रावधानों पर आपत्ति प्रकट करते हुए इसके निराकरण हेतु राज्यपाल से पहल करने का आग्रह किया। राज्यपाल को एक ज्ञापन भी सौंपा। उसमें ग्राम सभा के गठन की प्रक्रिया पर आपत्ति व्यक्त करते हुए कहा कि वर्तमान नियमावली में पारंपरिक ग्राम सभा का उल्लेख तो है, किंतु ग्राम सभा की सीमाओं की मान्यता एवं प्रकाशन की पूरी जिम्मेदारी जिला उपायुक्त को सौंप दी गई है। जबकि वर्ष 2023 में विधि विभाग द्वारा स्वीकृत एवं प्रकाशित नियमावली में ग्राम सभा का गठन परंपराओं एवं रूढ़ियों के अनुसार किया जाना प्रस्तावित था। राज्यपाल ने शिष्टमंडल से कहा कि वे इस संदर्भ में विभिन्न पहलुओं को देखकर समुचित कार्रवाई करेंगे।


राज्यपाल को सौंपे ज्ञापन में कहा गया है कि नियमावली में रुढि शब्द को गायब कर दिया गया है। जबकि पेसा रुल का मुख्य उद्देश्य रुढियों को ग्राम सभा के गठन प्रक्रिया में उपयुक्त स्थान दिए जाना है। पेसा की धारा 4 घ में प्रत्येक ग्राम सभा को अपनी परंपरा, रुढियों और सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण का अधिकार है। आगे कहा गया है कि ग्राम सभा के गठन जिम्मेदारी उपायुक्त को दे दी गयी है। दावा करने की प्रक्रिया को प्रशासन के दृष्टिकोण से  परिभाषित किया गया है।

आगे कहा गया है कि पांचवीं अनुसूची के क्षेत्र में आदिवासी समाज में ग्राम सभा का गठन तथा बहुस्तरीय आदिवासी व्यस्था सदियों से रुढियों के आधार पर होता रहा है। रुढियों में सामाजिक एवं धार्मिक प्रथाएं, दोनों समाहित होती है। धर्मांतरण के बाद रुढियों में बदलाव आता है। रुढिजन्य आदिवासी कस्टमरी लॉ का पालन करते हैं। धर्मांतरित आदिवासी कस्टमरी लॉ का पालन नहीं करते हैं। जो व्यक्ति स्वेच्छा से किसी अन्य धर्म में परिवर्तित हो चुके हैं वह आदिवासी धार्मिक अनुष्ठानों, देवस्थानों और अन्य धार्मिक जिम्मेदारियों को निभाने में सक्षम नहीं है। इसलिए ऐसे व्यक्तियों का खास पारंपरिक पदों पर बने रहना पेसा की भावना के विरुद्ध है। इसके अलावा कई अन्य दृष्टांतों का उदाहरण देते हुए पेसा कानून की मूल भावना के साथ खिलवाड़ करने का आरोप भी लगाया गया है। उसे संशोधित करने की मांग की गयी है।


 

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