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तमिलनाडु में कर्ज से तंग गरीबों की बेच दी गई किडनी, ऑपरेशन के बाद पैसा भी नहीं दिए

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द फॉलोअप डेस्क
तमिलनाडु के नामक्कल, पल्लिपलयम और पेरंबलूर जिलों में एक संगठित किडनी रैकेट का खुलासा हुआ है, जो कर्ज में डूबे मजदूरों और गरीबों को झांसे में लेकर उनकी किडनी निकाल लेता था। पीड़ितों को पहले 1 लाख रुपये तक एडवांस दिया जाता और बाकी रकम ऑपरेशन के बाद देने का वादा किया जाता, लेकिन बाद में न पैसा मिलता और न संपर्क। यह रैकेट सिर्फ तमिलनाडु तक सीमित नहीं था, बल्कि आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना और महाराष्ट्र तक फैला हुआ था।
राज्य स्तर पर जांच शुरू हो चुकी है। पांच दिन पहले दो बिचौलिए गिरफ्तार किए गए, जिसके बाद यह पूरी साजिश सामने आई। पुलिस के अनुसार, रैकेट का मास्टरमाइंड पल्लीपलयम के अन्नाई सत्य नगर का आनंदम है, जो इस वक्त फरार है। जांच में यह भी सामने आया कि पहले जिन लोगों ने अपनी किडनी बेची थी, वही बाद में बिचौलिए बन गए। ये लोग फर्जी आधार कार्ड और डोनर बनाकर मजदूरों को पेरंबलूर, त्रिची, सलेम और कोच्चि के अस्पतालों में ले जाते थे। मरीज को ICU में शिफ्ट करते ही बिचौलिए भाग जाते और होश आने पर मरीज को अस्पताल से बाहर निकाल दिया जाता।
इस रैकेट का खुलासा उस वक्त हुआ जब नामक्कल जिले के पल्लिपलयम गांव की 35 वर्षीय मल्लिका समेत 12 लोगों ने पुलिस को अपनी आपबीती बताई। मल्लिका ने बताया, "मैंने परिवार के लिए महिला स्वयं सहायता समूह से 1.50 लाख रु. कर्ज लिया था। चुका नहीं पाई तो भूखे मरने की नौबत आ गई। छह महीने पहले एक व्यक्ति घर आया और कहा कि कर्ज मिनटों में उतर जाएगा, सिर्फ एक किडनी बेचनी पड़ेगी। मैं और मेरे पति तैयार हो गए। उसे हमारे हालात की पूरी जानकारी थी। हम मजबूर थे, इसलिए 4-4 लाख रु. में सौदा तय हुआ। उसने सारे कागज खुद बनाए और 50 हजार रु. एडवांस दिए। फिर एक दिन गाड़ी आई और मुझे पेरंबलूर के एक प्राइवेट अस्पताल ले जाया गया। छह दिन बाद मुझे डिस्चार्ज कर दिया गया। उन्होंने मेरी एक किडनी ले ली, लेकिन 50 हजार के बाद एक रुपया भी नहीं मिला। अब साढ़े तीन लाख किससे लें, कोई नहीं बता रहा।"
अपनी कहानी सुनाते-सुनाते मल्लिका रोते-रोते फर्श पर बेहोश हो गईं। जब मुश्किल से होश में आईं तो कहा, "अब न भारी सामान उठा सकती हूं, न ज्यादा देर खड़ी रह सकती। पूरा दिन फर्श पर पड़े ही बीतता है।" मल्लिका जैसी ही हालत पल्लिपलयम के पांच और और नामक्कल जिले के कुल 12 पीड़ितों की है, जिन्होंने इसी तरह अपनी किडनी बेच दी लेकिन पैसे नहीं मिले। स्थानीय अधिकारियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि सरकार इन लोगों को संरक्षण और जनकल्याणकारी योजनाओं का भरोसा दे, तो सिर्फ इरोड और नामक्कल जिलों से ही 1,000 से ज्यादा पीड़ित सामने आ सकते हैं। इस मामले में कुछ निजी अस्पतालों और सरकारी कर्मचारियों की मिलीभगत की भी जांच हो रही है। रैकेट का पूरा ढांचा माइक्रोफाइनेंस मॉडल जैसा था, जरूरतमंदों को एडवांस रकम देकर बड़ी रकम का झांसा दिया जाता था, लेकिन किडनी निकलने के बाद उन्हें छोड़ दिया जाता था। फिलहाल राज्य स्तरीय जांच जारी है और रिपोर्ट अगले हफ्ते तक आने की उम्मीद है।

 

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