द फॉलोअप डेस्क
सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSUs) में विदेशी निवेश की सीमा को मौजूदा 20% से अधिक करने पर गंभीरता से विचार कर रही है। यह कदम ऐसे समय पर उठाया जा रहा है जब वैश्विक आर्थिक हालात चुनौतीपूर्ण बने हुए हैं और भारत सरकार अपने आर्थिक सुधार एजेंडे को तेज गति देना चाहती है।
जानकारी के मुताबिक, सरकार का मानना है कि यदि विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाई जाती है, तो इससे सार्वजनिक बैंकों की पूंजी स्थिति में सुधार होगा। इससे न केवल उनकी विस्तार योजनाओं को बल मिलेगा, बल्कि डिजिटल और इन्फ्रास्ट्रक्चर सुधारों में भी तेजी लाई जा सकेगी। इसके अतिरिक्त, यह बदलाव विदेशी निवेशकों के लिए भी पीएसयू बैंकों को एक अधिक आकर्षक विकल्प बना सकता है।

निजी बनाम सार्वजनिक बैंक: निवेश सीमा में असमानता
वर्तमान में जहां निजी बैंकों में विदेशी निवेश की अधिकतम सीमा 74% तक है, वहीं पीएसयू बैंकों के लिए यह सिर्फ 20% तक सीमित है। इस असमानता की वजह से विदेशी निवेशक अब तक मुख्य रूप से निजी बैंकों की ओर आकर्षित होते रहे हैं। सरकार का तर्क है कि अब वक्त आ गया है कि इस अंतर को कम किया जाए ताकि सार्वजनिक बैंकों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता भी बढ़ सके।
इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, यदि यह प्रस्ताव अमल में आता है तो विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) और अन्य अंतरराष्ट्रीय निवेशक सार्वजनिक बैंकों में अधिक रुचि दिखा सकते हैं। इससे न केवल बैंकों को पूंजी जुटाने में आसानी होगी, बल्कि वित्तीय प्रणाली में भरोसा भी बढ़ेगा। जानकारों का मानना है कि यह पहल दीर्घकालिक तौर पर बैंकिंग सेक्टर को मजबूती प्रदान कर सकती है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और सुधार
उल्लेखनीय है कि 1990 के दशक में आर्थिक उदारीकरण के बाद से निजी बैंकों में विदेशी निवेश को बढ़ावा मिला, जबकि सार्वजनिक बैंकों पर सरकार ने अपना नियंत्रण बनाए रखने के उद्देश्य से निवेश सीमा को सीमित रखा। हालांकि, समय के साथ यह रणनीति विदेशी पूंजी प्रवाह को प्रभावित करने लगी। अब सरकार इस अंतर को दूर करने के लिए तैयार दिख रही है, जिससे कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा में बने रह सकें।
