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सुप्रीम कोर्ट के निर्देश की नाफरमानी, विस्थापन-पुनर्वास आयोग के गठन की बात पुरानी

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यह पहला मौका है जब भारत में कोयला खदानों को कॉमर्शियल माइनिंग के लिए खोला जा रहा है। नीलामी प्रक्रिया को लॉन्च करने के दौरान प्रधानमंत्री ने कहा कि कोयला खनन आदिवासी बहुल क्षेत्रों में विकास का मार्ग प्रशस्त करेगा। लेकिन कई विशेषज्ञ इसे सिरे से खारिज करते हैं। इनका मानना है कि यह केवल कोयले का निर्यात नहीं,बल्कि प्राकृतिक आपदाओं,  विस्थापन और प्रदूषण को भी बढ़ायेगा। झारखंड के कोयला क्षेत्रों में कोई ऐसा गांव नहीं है, जहां खनन से विस्थापन नहीं हुआ या विस्थापित लोगों को समुचित पुनर्वास मिला हो। प्रधानमंत्री यह को बताना चाहिए कि जिन इलाकों में पहले से कोयला खनन हो रहा है, वहां कैसा और किस तरह का विकास हुआ है? प्रधानमंत्री देश का कोई ऐसा क्षेत्र बता दें, जहां कोयला खनन से पर्यावरण को नुकसान नहीं हुआ हो। विस्थापन की जटिल समस्याओं को फोकस करती ये रपट।

नारायण विश्वकर्मा

कोयला खनन में सबसे अधिक लोग विस्थापित हुए 
यह कितनी अजीब बात है कि झारखंड बनने के 20 साल में भी विकास के नाम पर विस्थापन का सिलसिला कभी थमा नहीं। राज्य सरकार ने कभी विस्थापितों की सूची नहीं बनायी, न कभी कोई संख्या जारी की। वैसे पुरानी परियोजनाओं के विस्तार में कई छोटे-बड़े उद्योग, डैम, खदानों आदि परियोजनाओं के कारण लाखों लोगों को विस्थापन की मार झेलनी पड़ी है। दुर्भाग्य देखिये कि जमीन मालिकों को दिये गए मुआवजे, नौकरी और पुनर्वास का वादा भी सही ढंग से पूरा नहीं किया गया। सिर्फ कोयला खनन में करीब 2,68,588 से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं। केंद्र व राज्य सरकारें 2007 से 2013 तक विस्थापितों की समस्या के समाधान के लिए अधिनियम या नीति बनाई है। लेकिन कभी इसका अनुपालन नहीं हुआ।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर अमल नहीं 
अभी तक विभिन्न कोल कंपनियां, उद्योग क्षेत्र, सिंचाई परियोजना में करीब 30 लाख एकड़ जमीन अधिग्रहण की हैं। लेकिन आजादी के बाद से आज तक विस्थापितों को न्याय व अधिकार नहीं मिला है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट फैसला दिया कि नई भूमि बाजार के वर्तमान दर से रैयतों को मुआवजा दिया जाये, लेकिन राज्य सरकार व आठों कोल कंपनियां इसका अनुपालन नहीं कर रही है। कोर्ट ने सरकार व आठों कंपनियों से रैयतों का विस्थापन बंद करने को कहा। अदालत ने सरकार से कोल इंडिया पुनर्वास नीति 2012, भारत सरकार पुनर्वास नीति 2007, झारखंड सरकार पुनर्वास नीति 2008 व एक्ट 2013 धारा 24 के अनुसार पुराना अधिग्रहण जमीन का मुआवजा देने के अलावा विस्थापन-पुनर्वास आयोग के गठन का निर्देश भी दिया। 

विस्थापितों के मसीहा थे विनोद बाबू
झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक बिनोद बिहारी महतो को विस्थापितों का मसीहा कहा जाता है। विस्थापन के खिलाफ उन्होंने आंदोलन के जरिये और कोर्ट में भी कानूनी रूप से लड़ाई लड़ी। कोलियरी के राष्ट्रीयकरण के बाद 1973 में कोल इंडिया लिमिटेड अस्तित्व में आया। इसके बाद भारत कोकिंग कोल, इस्टर्न कोल फील्ड्स लिमिटेड,सेंट्रल कोल फील्ड्स लिमिटेड आदि सरकारी कंपनियों का गठन किया गया। इससे बाद राजनीतिक,आर्थिक और सामाजिक दृष्टिकोणों से कोयला अंचलों में व्यापक प्रभाव पड़ा। कोयलांचलों में निजी कंपनियों के मैनेजरों, ठेकेदारों, ट्रांसपोर्टरों, गुंडों, यूनियन के नेताओं ने हजारों की तादाद में राष्ट्रीयकरण के समय अवैध ढंग से अपने लोगों के नाम पुराने रजिस्टरों में चढ़वा लिया और उनकी भी बहाली हो गई।

अब और विस्थापन बर्दाश्त नहीं : दयामणि बारला
आदिवासी-मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच की संयोजिका और सामाजिक कार्यकर्ता दयामणि बारला ने कहा कि झारखंड का दुर्भाग्य देखिये कि यहां के भूमि पुत्रों को कभी खनिज संपदा का लाभ नहीं मिला। यहां के विस्थापित अपनी जमीन खोकर दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। खनन कार्य के लिए कृषि योग्य भूमि छीन ली गयी। मुआवजा नहीं मिला। नौकरी नहीं मिली। किसान अपने खेत गंवा कर मजदूर बना। लेकिन आज भी उसे उचित मजदूरी नहीं मिलती। श्रीमती बारला ने कहा कि केंद्र सरकार ने अभी तक राज्य सरकार को 300 करोड़ रायल्टी नहीं दी है। कॉमर्शियल माइनिंग बारे में उनका कहना था कि केंद्र इसे निजी हाथों में देकर विस्थापन को और बढ़ाना चाहती है। निजी कंपनियों को सिर्फ अपने मुनाफे से मतलब होगा। कॉमर्शियल माइनिंग में तो निजी कंपनियों को कोयला लूटने का भरपूर मौका मिलेगा। दरअसल, केंद्र सरकार का यह निर्णय लोककल्याणकारी राज्य की मूल अवधारणा के विपरीत है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने बड़ी चालाकी से लॉकडाउन के समय कॉमर्शियल माइनिंग योजना को लांच किया है ताकि लोग विरोध के लिए सड़क पर नहीं उतर सके। लेकिन अब विस्थापन किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं होगा। इसलिए इसका विरोध होगा और केंद्र सरकार को यह निर्णय हर हाल में वापस लेना पड़ेगा। 

झारखंड विस्थापितों का प्रदेश : डॉ. वासवी किड़ो 
झारखंड राज्य विस्थापित जन आयोग की डॉ. वासवी किड़ो का विस्थापन पर शोध ग्रंथ है। ‘’भारत में विस्थापन की अवधारणा और इतिहास’’ शीर्षक से लिखी किताब विस्थापन से जुड़ा एक दस्तावेज है। वह मानती हैं कि झारखंड विस्थापन का प्रदेश बन चुका है। झारखंड में कोल माइनिंग को लेकर विस्थापन का लंबा इतिहास है। इसमें आदिवासी समुदाय सबसे अधिक प्रभावित हुआ है। विडंबना देखिये कि केंद्र-राज्य सरकारों के पास बीसीसीएल, सीसीएल, ईसीएल या अन्य परियोजनाओं के चलते विस्थापित हुए लोगों की पूरी सूची उपलब्ध नहीं है। उन्होंने कहा कि कोयले के निजीकरण पर उतारू केंद्र सरकार की मंशा कभी सफल नहीं होगी। निजीकरण में तो कुछ सुना ही नहीं जायेगा। सीधे बुलडोजर चलेगा। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। केंद्र सरकार को पहले विस्थापितों की समस्याओं का समाधान करना होगा। उन्होंने कहा कि जमीन जिसकी, मालिकी उसकी। इसी फार्मूले पर कॉमर्शियल माइनिंग का तीखा विरोध होगा। इस संबंध में उन्होंने 6 मार्च को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मिलकर कहा है कि राज्य सरकार जल्द से जल्द विस्थापित आयोग का गठन करे ताकि विस्थापितों को न्याय मिले।