चंद्रभूषण, दिल्ली:
कॉमेडियन मुनव्वर फारूकी 29 नवंबर 2021 से कॉमेडियन नहीं रहा। अपने 12 प्रोग्राम एक के बाद एक कैंसिल होने के बाद उसे लगा कि अब उससे नहीं हो पाएगा। यह सिलसिला शुरू होने से पहले उसने एक महीने की जेल काटी थी। कुछ ऐसे जोक्स के लिए जो उसने नहीं सुनाए, और वे थे क्या, यह भी कोई नहीं जानता। मैंने मुनव्वर फारूकी के ज्यादातर वीडियो देख डाले। सिर्फ यह जानने के लिए कि क्या वह वाकई देवी-देवताओं का मजाक उड़ाता है। इसके आसपास की सिर्फ एक चीज वहां दिखी। ‘लड़कियों का लाइन क्रॉस करना लोगों को बिल्कुल पसंद नहीं है, इसीलिए उनका नाम वे सीता नहीं रखते।’ अलबत्ता मोदी, योगी और नोटबंदी-जीएसटी वगैरह को लेकर उसके तीन-चार जोक जरूर दिखे, जिनके बिना कोई स्टैंड-अप कमीडियन पब्लिक में जा ही नहीं सकता। भाजपा वाले भी यह बात अच्छी तरह जानते हैं, फिर भी पता नहीं क्या हुआ, इंदौर में उनके एक युवा नेता ने मुनव्वर के जोक्स से अपनी भावनाएं आहत होने की आशंका जताई और पुलिस उसको पकड़कर जेल ले गई।
ध्यान रहे, इंदौर को पिछले कई वर्षों से राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान के तहत देश का सबसे साफ-सुथरा शहर बताया जा रहा है। हर साल इसकी घोषणा होती है। अखबारों में खबर छपती है और टीवी में टिकर चलता है। स्वच्छता अभियान वही है, जिसकी शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजधानी की सबसे साफ सड़क पर झाड़ू फेरकर किया था। फिर उनके कृपापात्रों को जहां भी मौका मिला, वहीं उन्होंने ठेला भर कूड़ा गिरवाया और झाड़ू लेकर फोटो खिंचा लिए। इस दौरान कई इतने अटपटे दृश्य बने कि खुद प्रधानमंत्री को ही एक दिन उन्हें बरजना पड़ा। बहरहाल, मुनव्वर के लिए कॉमेडी अगर सिर्फ एक कारोबार थी तो उसके फैसले को दिल पर लेने की जरूरत नहीं है। वह अच्छी कॉमेडी करता था। उन दायरों में भी जाता था, जिन्हें छूने में कमाऊ कमीडियंस के हाथ कांपते हैं। फिर भी जवान आदमी है, कोई और हुनर सीख लेगा, कुछ और धंधा कर लेगा। लेकिन यह वाकया अगर उसे एक उदास या उबाऊ इंसान बना देता है तो इसमें हमारा नुकसान है।

संयोग कहें कि मुनव्वर के जिक्र से मुझे उसी के नाम वाला अपना एक दोस्त याद आता है। मेरी ही तरह विज्ञान से खबरों की तरफ आया इंसान। हमेशा टेस्ट कैप पहनकर घूमने वाला मुनव्वर आलम ‘शौक़ी’। 1994 में कुछ दिनों के लिए हमारी दोस्ती बनी थी। फिर वह चला गया। इंडियन एक्सप्रेस अखबार में उसकी नौकरी थी और राज्य बिजली बोर्डों की बदहाली और कर्जखोरी पर उसकी सीरियल रिपोर्टिंग ने तब खासी हलचल मचा रखी थी। लेकिन अपनी खबरों पर, बल्कि अपने बारे में ही बात करना उसका स्वभाव नहीं था। सिर्फ एक बार उसने अपना एक दुख मुझे बताया, जिसके हल के लिए मुझसे जो बन पड़ा, मैंने किया। लेकिन सिर्फ अपने नाम के चलते खुद पर मंडरा रहे खतरे में किसी की मदद लेने की हतक उसे ऐसी जाकर लगी कि उसने इलाका ही छोड़ दिया। सालों बाद मिला तो ‘सिल्विया प्लाथ’ पढ़ाई। अवसाद की महारानी।
मुनव्वर से संग-साथ के उस दौर में कुछ-कुछ बातें उसके बारे में हमें पता चली थीं। हमें, यानी जनमत डेरे के हम पांच लोगों को। रामजी राय, इरफान, संतोष चंदन और मैं। पांचवें डॉ. प्रकाश चौधरी वहां से जाने की और अवधेश कुमार सिंह आने की प्रक्रिया में थे। मुनव्वर आरा शहर का रहने वाला था। उसके भाई मुशर्रफ आलम ‘ज़ौक़ी’ उर्दू के नामी कहानीकार थे। अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से उसने फिजिक्स से एम. एससी. की और डॉक्ट्रेट के लिए रजिस्ट्रेशन कराया ही था कि बाबरी मस्जिद टूट गई और उसका ‘नर्वस ब्रेकडाउन’ हो गया। यह शब्द तबतक मेरे लिए सिर्फ बोलचाल का हिस्सा था- ‘इतना मत हंसाओ यार, नर्वस ब्रेकडाउन हो जाएगा।’ मुनव्वर के बताने से ही पता चला कि यह एक खतरनाक मेडिकल कंडीशन है। इसमें लोग अक्सर मर जाते हैं और बच गए तो जिंदगी भर अपंगों से भी बुरी हालत में रहते हैं।
इस बीमारी के ब्यौरे उससे जानने की मैंने बहुत कोशिश की, पर वह हंसकर टाल गया। जब उसको लगा कि मैं सचमुच इस बारे में जानकारी हासिल करना चाहता हूं तो कहा कि ‘कभी टाइम निकालकर मेरे घर वालों से बात करो। खासकर भाभी से, जिन्होंने बीमारी के दौरान मेरी तीमारदारी की थी।’ यह बातचीत हो पाती, इसके पहले ही वह चला गया। मैंने राय बनाई कि मन की लोच चली जाती है, कैंसर की तरह इस बीमारी का भी घाट बन जाता होगा।
मुनव्वर आलम से मुनव्वर फारूकी तक काफी वक्त गुजर गया। और किसी का नर्वस ब्रेकडाउन होने की खबर भी आजकल नहीं सुनाई देती। अलबत्ता बीच-बीच में शंभूलाल रैगर और कुछ उसी के छाया व्यक्तित्वों से परिचय जरूर हो जाता है, जो नाम से या कपड़ों से लोगों को पहचान लेते हैं और अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार उनके लिए मृत्युदंड या किसी और तरह के दंड की व्यवस्था करते हैं।
कोरोना शीर्ष पर था तो मेरी सोसाइटी के वॉट्सऐप ग्रुप में यह सुझाव उभरा कि क्यों न हम अपने गेट पर यह बैनर लगा दें कि ‘मुसलमान फल/सब्जी विक्रेता इधर न आएं!’ ज्यादा टची नहीं होने का जी। कोई मेरा नर्वस ब्रेकडाउन थोड़े न हुआ है। देश की मुख्यधारा इस स्थिति को पसंद करती है तो ऐसा सेंत-मेंत में नहीं है। सदियों से हम अपने देसी चंगेज खां और नादिरशाह के इंतज़ार में पलकें बिछाए बैठे हैं। खून के समुद्र से उभरता हुआ एक राष्ट्रनायक! नवंबर 1984 की शुरुआत सिखों की दुकानें लूटने और उन्हें दौड़ा-दौड़ाकर मारने से हुई तो मेरे मित्र विष्णु राजगढ़िया गुमसुम हो गए। भुरकुंडा (हजारीबाग) में उनका मारवाड़ी परिवार उन्हीं की जमाई हुई किताब-कॉपियों की दुकान से खड़ा हो पाया था। लेकिन सरदारों को लुटते-पिटते देख विष्णु को लगा कि यह सारी मेहनत किसी काम की नहीं है। गनीमत इतनी ही रही कि उन्हें अस्पताल नहीं ले जाना पड़ा। किसी तरह उनके छोटे भाइयों ने दुकान संभाली और कीचड़ में नाखून गड़ाकर चलते हुए वे खुद पत्रकारिता में आ गए।
2002 में मैं जनसत्ता अखबार में था। 27 फरवरी को एडिटोरियल मीटिंग के बाद अगले दिन बजट पर किससे लिखवाया जाए, इसपर बात हुई। फिर दिन का काम शुरू होते ही टीवी पर चीख-पुकार और धुएं के गुबार के बीच खबर आने लगी कि गुजरात के गोधरा स्टेशन के पास कुछ उपद्रवियों ने साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन का एक डिब्बा उसमें बैठे यात्रियों समेत जला दिया है। तमाशा इस राज्य में लंबे समय से मचा हुआ था। 26 जनवरी 2001 को आए भूकंप के बाद सरकार और बिल्डरों की संहारक सांठगांठ उजागर हुई थी। इसके साथ ही राहत बंटवारे में सरकारी लूट की खबरों ने बीजेपी को अपना मुख्यमंत्री बदलने को मजबूर कर दिया था। कुछ ही समय बाद चुनाव होने वाले थे। पार्टी का सूपड़ा साफ होना तय था। लेकिन नए मुख्यमंत्री ने ......... (प्रकाशनाधीन पुस्तक '3/4 एक्सप्लोसिव' का एक अंश)
नाेट: आलम का अर्थ संसार होता है।

(चंद्रभूषण लेखक और कवि हैं। जनवादी पत्रकारिता की। नवभारत टाइम्स के संपादकीय विभाग से संबंद्ध रहे। कई किताबें प्रकाशित। संप्रति स्वतंत्र लेखन।)
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