शहादत दिवस, 16 जनवरी पर खास : जब कॉमरेड ने AK-47 ताने हत्यारों के सामने डटकर कहा था, “हां, मैं ही हूं महेंद्र सिंह”
मधुकर/जेब अख्तर
आज जब झारखंड की सड़कों पर सवाल हैं, लेकिन सदन में खामोशी है; जब आदिवासी जमीन फिर से खतरे में है, जब योजनाओं का पैसा काग़ज़ों में बह रहा है और जब सत्ता–विपक्ष का फर्क धुंधला पड़ चुका है, तो बार-बार एक नाम याद आता है, कामरेड महेंद्र सिंह। वे सिर्फ एक नेता नहीं थे। वे सवाल थे। वे बेचैनी थे। वे उस लोकतंत्र की अंतरात्मा थे, जो आज झारखंड में बार-बार दम तोड़ती दिखती है। महेंद्र सिंह सचमुच सिंह थे, ऐसे सिंह, जिनकी दहाड़ सड़क से लेकर सदन तक सरकार को सुननी ही पड़ती थी। इतना निडर व्यक्तित्व कि एके-47 ताने हत्यारों के सामने भी डटकर बोले, “हां, मैं ही हूं महेंद्र सिंह।” और गोलियों से छलनी कर दिए गए। आज, जब झारखंड में डर का माहौल चुपचाप फैल रहा है, तब यह सवाल और तीखा हो जाता है, आज ऐसा कहने की हिम्मत किसमें है?
उनकी हत्या सिर्फ एक व्यक्ति की हत्या नहीं थी, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति पर हमला था, जिसमें सत्ता से सवाल पूछना अपराध नहीं माना जाता था।
यह दुर्भाग्य ही था कि उनका निजी संरक्षक साथी और ड्राइवर मौके से भाग गए। लेकिन जैसे ही गांव तक खबर पहुंची, पूरा इलाका उमड़ पड़ा। कड़ाके की शीतलहर के बावजूद, हजारों लोग उस योद्धा को अंतिम विदाई देने पहुंचे। आज, जब किसी नेता की मौत पर भीड़ जुटती है, लेकिन सवाल नहीं उठते, तो समझ में आता है कि महेंद्र सिंह क्यों अलग थे।
वे जेल में रहे, लेकिन जेल से डरने वालों में नहीं थे। जहां-जहां रहे, वहां जेल-शासन को भी जवाबदेह बनाया। दलित, वंचित और बेसहारा कैदियों के लिए बेहतर भोजन, कपड़े और न्याय की लड़ाई लड़ी। आज, जब जेल सुधार सिर्फ रिपोर्टों तक सिमट गया है, तब महेंद्र सिंह की राजनीति और ज्यादा प्रासंगिक लगती है।

जब वे पहली बार बिहार विधानसभा पहुंचे, तो उनके तार्किक भाषणों और बेखौफ टिप्पणियों ने साफ कर दिया कि यह नेता लंबी रेस का घोड़ा है। प्रत्यायुक्त समिति के सभापति के रूप में उन्होंने अवैध बहालियों की पोल खोल दी और बहालियां रद्द करानी पड़ीं।
आज, जब नियुक्तियों और ठेकों पर सवाल उठाने से ही नेता बचते हैं, तब महेंद्र सिंह की ईमानदारी सत्ता के लिए असहज सच बनकर सामने आती है। झारखंड राज्य बनने के बाद, 2000 के पहले ही बजट सत्र में उनकी आवाज 81 विधायकों में सबसे भारी थी।
जंगली हाथियों के आतंक से पहाड़िया समुदाय का पेड़ों पर रात गुजारना हो, जमीन की लूट हो, या विधायकों-मंत्रियों के वेतन बढ़ाने का मुद्दा- वे हर जगह खड़े थे।
आज, जब विस्थापन, मुआवज़ा और कॉरपोरेट हितों पर चुप्पी है, तब यह सवाल उठता है—अगर महेंद्र सिंह होते, तो क्या हालात ऐसे होते?
बाबूलाल मरांडी की सरकार में जब उन्होंने भ्रष्टाचार पर हमला बोला और मुख्यमंत्री ने कहा कि भ्रष्टाचार के कारण उन्हें नींद नहीं आती, तो महेंद्र सिंह का जवाब आज भी झारखंड की राजनीति पर सटीक बैठता है, “नींद नहीं आना कांके जाने का पहला लक्षण है। नींद मत गंवाइए, भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाइए।”
उन्होंने प्रोटोकॉल की संस्कृति पर सवाल उठाया। डीजीपी के हूटर बंद करवाए।
आज, जब डीसी से लेकर विधायक तक हूटर के सहारे शहर रौंदते हैं, तब यह याद दिलाता है कि सत्ता जनता के लिए होनी चाहिए, जनता सत्ता के लिए नहीं।
नक्सलवाद पर उनका विश्लेषण आज भी उतना ही प्रासंगिक है, उन्होंने साफ कहा था कि विकास का पैसा जब अफसर और ठेकेदार खा जाते हैं, तब गरीब मजबूर होकर हथियारबंद ताकतों के सामने सिर झुकाता है। आज, जब योजनाएं हैं लेकिन ज़मीन पर भरोसा नहीं, तब नक्सलवाद सिर्फ बंदूक नहीं, व्यवस्था की विफलता बनकर सामने आता है- जैसा महेंद्र सिंह कहते थे।
महेंद्र सिंह ऐसे नेता थे कि सरकार और स्पीकर तक कहते थे-विपक्ष उनकी पालकी ढोता है।
नेता विपक्ष को भी उनके प्रस्तावों पर मुहर लगानी पड़ती थी। यही वजह थी कि जब बाबूलाल मरांडी की सरकार गिरी, तो उसके पीछे सबसे निर्णायक भूमिका महेंद्र सिंह की थी।
लेकिन सत्ता ने उन्हें कभी माफ नहीं किया। राज्यपाल से लेकर केंद्र तक, हर स्तर पर उनकी अनदेखी हुई। और अंततः, चुनाव से ठीक पहले, उनकी हत्या कर दी गई। महेंद्र सिंह की हत्या इस राज्य और संसदीय लोकतंत्र-दोनों के लिए एक गहरा घाव है। लेकिन सच यह है कि वे मरे नहीं।
जब भी झारखंड में जमीन की बात होती है, जब भी आदिवासी अस्मिता सवालों में आती है,
जब भी सत्ता सवालों से भागती है- महेंद्र सिंह जीवित हो उठते हैं। आज झारखंड को किसी नई पार्टी या नए नारे से ज़्यादा महेंद्र सिंह जैसी राजनीति की ज़रूरत है- बेहिचक, बेखौफ और बेईमान सत्ता के खिलाफ खड़ी राजनीति।
कामरेड महेंद्र सिंह इतिहास नहीं हैं। वे आज भी हमारे विचारों, संघर्षों और सवालों में ज़िंदा हैं।
(महेंद्र सिंह के पैतृक गांव खंभरा, बगोदर में 16 जनवरी को उनका शहादत दिवस हर साल धूमधाम से मनाया जाता है। वर्ष 2005 में इसी दिन नक्सलियों ने गोलियों से छलनी कर उनकी हत्या कर दी थी)
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