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बिहार की सियासत में चिराग-मांझी की चिंगारी, पीछे दिल्ली का दांव या बिहार की बिसात!

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व्यंकटेश पांडेय
चिंगारी कोई भड़के, तो सावन उसे बुझाये। ये आनंद बख्शी की लिखी लाइन है। लेकिन बिहार की सियासत में जो चिंगारी चिराग पासवान और जीतन राम मांझी के बीच भड़की है, उसे यहां कि झमाझम बारिश भी नहीं बुझा पा रही। चुनाव की तरफ बढ़ रहा बिहार का सियासी मिजाज दिन प्रतिदिन और पेचीदा होता चला जा रहा है।  
एक तरफ चिराग दलित वोट बैंक को गोलबंद करने की कोशिश कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ जीतन राम मांझी ने LJP नेता को अनुभवहीन कहने के साथ-साथ समझदारी का पाठ भी पढ़ा दिया। LJP की तरफ से पलटवार भी हुआ लेकिन ये चिराग पासवान ने नहीं किया बल्कि उनके बहनोई ( जिन्हें चिराग पासवान जीजा कहते हैं) और जमुई से सांसद अरुण भारती ने किया। उन्होंने पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि बिहार विधानसभा चुनाव में बहुमत साबित करने से पहले इस्तीफा देने का अनुभव वाकई चिराग पासवान के पास नहीं है। इतना ही नहीं उन्होंने एक सोशल मीडिया पोस्ट में ये भी कहा कि "बिहार की जनता और पार्टी कार्यकर्ताओं की लगातार मांग है, अब चिराग पासवान बिहार में आकर बड़ी जिम्मेदारी संभालें।"

तो सवाल दों हैं। पहला राज्य में बड़ी जिम्मेदारी का मतलब होता क्या है? और दूसरा क्या ये महज दलित वोट बैंक को साधने की कोशिश भर है या मसला कुछ और है? तो आइए इन्हीं सवालों के अक्स तले बिहार में बिछ रही सियासी बिसात को समझने की कोशिश करते हैं।
पिछले महीने LJP के नेता और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने शाहाबाद क्षेत्र के केंद्र यानी आरा में एक जनसभा को संबोधित किया। जिसमें उन्होंने पहली बार ऐलान किया कि वो बिहार विधानसभा का चुनाव लड़ेंगे, हालांकि कहां से लड़ेंगे ये पार्टी तय करेगी। साथ ही उन्होंने ये भी जोर देकर कहा कि वो सभी 243 सीटों पर लड़ेंगे, हालांकि तालियों की गड़गड़ाहट के बीच कहा कि वो चिराग बन कर लड़ेंगे और NDA को मजबूत करेंगे।

ये वही शाहाबाद है, जहां पिछले चुनाव (2020) में चिराग पासवान की पार्टी ने NDA को लगभग 11 सीटों पर डेंट लगाया था। 2020 के विधानसभा चुनाव के जब नतीजे आए थे, तब NDA को शाहाबाद की 22 सीटों में से केवल दो सीटों पर ही जीत मिली थी और दोनों सीटें बीजेपी के ही खाते में गई थी। बीजेपी आरा और बड़हरा की सीट जीतने में कामयाब रही थी। आरा से अमरेंद्र प्रताप सिंह ने और बड़हरा से राघवेंद्र प्रताप सिंह ने जीत हासिल की थी। इन 11 सीटों में दिनारा, ब्रह्मपुर, जगदीशपुर  में दूसरे नंबर पर LJP दूसरे नंबर पर रही। हालांकि वो 135 सीटों में केवल एक ही जितने में कामयाब रही थी। वहीं 2020 के विधानसभा चुनाव में हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) ने 7 में चार सीटों पर जीत हासिल की।

बिहार में दलित आबादी 19 फीसदी है, जिस पर दोनों दलों की निगाह है। लेकिन बात बस इतनी भर नहीं है। क्योंकि जिस तरह से अतीत में दिल्ली ने चिराग पासवान का स्वागत किया और पशुपति पारस धीरे-धीरे नेपथ्य की तरफ धकेल दिए गए और चिराग पासवान केंद्र सरकार में मंत्री बन गए, ये सभी ने देखा। तो क्या दिल्ली का रायसीना हिल प्रधानमंत्री मोदी के हनुमान के लिए नई बिहार की जमीन पर नई कहानी लिख रहा है। ये सवाल इसलिए क्योंकि नीतीश कुमार का स्वास्थ्य एक तरफ लगातार चर्चा के केंद्र में रहा है। साथ ही बीजेपी लगभग दो दशक से यहां सहयोगी की भूमिका में जरूर रही है लेकिन सीधे तौर पर पार्टी ने अभी तक बिहार में सत्ता का स्वाद चखा नहीं है। जिसका मलाल उसे अभी भी है। तो क्या प्रधानमंत्री के हनुमान के जरिए बीजेपी बिहार में फतह करना चाहती है, क्योंकि बिहार और बंगाल दो ही राज्य तो बचे हैं, जहां के सत्ता सिंहासन पर कभी पार्टी बैठी नहीं है।  

जीतन राम मांझी भले केंद्र की सत्ता में मंत्री पद पर आसीन हैं लेकिन वो समय-समय पर अपनी नाराजगी जताते रहते हैं। मांझी को राजनीति मुखर चेहरा बनाने में नीतीश कुमार का अहम योगदान रहा है। जिसका तार एक दशक पहले से जुड़ा है। दरअसल साल 2014 के लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी JDU महज दो सीटों पर ही सिमट गई थी। तब अपने प्रशंसकों के लिए सुशासन और विकास के नायक बन चुके नीतीश कुमार ने हार का जिम्मा लेते हुए CM के पद से इस्तीफा दे दिया। उसके बाद बिहार की सियासत में हलचल मच गई और कयास लगाए जानें लगे की बिहार का अगला CM कौन होगा, तभी नीतीश कुमार ने एक चौंकाने वाला फैसला लिया और  तमाम अटकलों पर पूर्ण विराम लगाते हुए मुसहर जाति से आने वाले जीतन राम मांझी को बिहार का मुख्यमंत्री बना दिया, जिससे राज्य की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत हो गई। हालांकि, यह लंबे समय तक नहीं चला और साल 2015 में नीतीश और मांझी के बीच टकराव समाने आ गया। दरअसल नीतीश ने मांझी को हटाने का फैसला किया, क्योंकि उनकी समझ से मांझी स्वतंत्र रूप से निर्णय ले रहे थे और JDU की रणनीति से हटकर काम कर रहे थे। फरवरी 2015 में नीतीश ने दोबारा मुख्यमंत्री बन गए, जिसके बाद मांझी ने हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) बनाकर अलग राह चुन ली।

कुल मिलाकार नीतीश कुमार और जीतन राम मांझी की दोस्ती मुख्य रूप से राजनीतिक गठजोड़ पर आधारित रही है, जो समय के चक्र के साथ विश्वास, टकराव,और फिर से सहयोग के दौर से गुजरी है। तो क्या अभी नीतीश कुमार के लिए जीतन राम मांझी एक सहयोगी की भूमिका में हैं? या फिर माजरा कुछ और है। क्योंकि दिल्ली और पटना के बीच दूरी पाटने की कोशिश तो अनवरत हो रही है। ऐसे में कौन किसका साथ देगा और किसका इशारा बिहार की राजनीति में नई इबारत लिखेगा, इसके लिए तो इंतजार करना होगा।
 

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