Alok Gagdekar, Mumbai
आपके अंतर्मन को झकझोर देने वाली यह एक सच्ची कहानी है। ज़रा सोचिए, जब 15 अगस्त 1947 को भारत जैसे 35 करोड़ की आबादी वाले देश को आज़ादी मिली, तो उसके कुछ ही दिन बाद 20 लाख से अधिक लोगों को आज़ाद न किया गया। जिस वक्त पूरा देश जश्न में डूबा था, उस समय एक पूरा समुदाय अपने परिवारों समेत आवासीय जेलों में क़ैद था।
यह कहानी है भारत की घुमंतू एवं विमुक्त आदिवासी जनजातियों की। लगभग 190 जातियाँ, जिनमें सांसी, भामटा, पारधी, वराड, कैकाडी, भेड़कुट, कंजर जैसी जातियाँ शामिल थीं, जिन्हें ब्रिटिश राज ने 1871 में ‘जन्मजात अपराधी’ (Born Criminals) घोषित किया था। उस समय का ‘क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट’ इन्हीं के लिए बना था। कलकत्ता आर्मी के जनरल स्लीमन ने इन समुदायों की एक सूची तैयार की, जिनके आधार पर इन्हें संगठित अपराधी करार दिया गया।
ब्रिटिश हुकूमत ने देशभर में 52 आवासीय जेलें बनाई थीं, जहाँ इन समुदायों को उनके पूरे परिवारों सहित क़ैद किया गया। एक शर्त थी—सरकार उनके रीति-रिवाजों में हस्तक्षेप नहीं करेगी, लेकिन इसके बावजूद उनकी ज़िन्दगी नारकीय बना दी गई थी।
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पुरुषों को हथकड़ियाँ और बेड़ियाँ पहनाकर मिलों में और सरकारी इमारतों के निर्माण में झोंक दिया गया। स्त्रियाँ अंग्रेज़ों के घरों की सफाई से लेकर उनके बच्चों को दूध पिलाने तक के काम में लगाई गईं। लेकिन इतिहास का यह पहलू अक्सर छुपा दिया गया कि इन्हीं स्त्रियों के दूध से पले कई योद्धाओं ने जंगल सत्याग्रह की चिंगारी सुलगाई थी।
इन जातियों के वंशज वही लोग थे जिन्होंने कभी हूण, शक, मंगोल, मुग़ल या अंग्रेज़ों की ग़ुलामी स्वीकार नहीं की। ये वही रक्त था जो तांत्या भील, रानी दुर्गावती, ताना भगत, जोरिया भगत, घासी सिंह जैसे महान स्वतंत्रता सेनानियों में बहता था। इन्होंने 1857 के विद्रोह से भी पहले अंग्रेज़ों के खिलाफ बिगुल फूंका था और जंगलों की रक्षा में अपना लहू बहाया था।
जब अंग्रेज़ भारतीय मंदिरों से मूर्तियाँ और आभूषण लूटकर इंग्लैंड ले जा रहे थे, तब यही समुदाय समुद्री मार्गों पर उन्हें रोककर वह संपत्ति राजा-रजवाड़ों को लौटा देते थे—जिसके बदले उन्हें शाही इनाम मिलते थे। यही वजह थी कि इन्हें सनातन संस्कृति के रक्षक भी कहा जाता था। लेकिन जैसे-जैसे उनकी ताक़त अंग्रेज़ों की आँख की किरकिरी बनने लगी, वैसे-वैसे उनका दमन तेज़ हुआ।
1871 में बना हुआ वह काला कानून आज़ादी के साथ ही समाप्त हो जाना चाहिए था। लेकिन अफ़सोस, ऐसा नहीं हुआ। जब 15 अगस्त 1947 को देश को आज़ादी मिली, तब भी ये समुदाय ‘नोटिफाइड क्रिमिनल’ बने रहे। हमारे पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू, जो स्वयं कभी कश्मीर से प्रयागराज तक एक घुमंतू की तरह सफ़र कर चुके थे और इसीलिए ‘नेहरू’ कहलाए, इस विषय पर तब तक ध्यान नहीं दे सके, जब तक कि पाँच साल बीत न गए।
और तब, 31 अगस्त 1952 को, देश की सबसे बड़ी ‘सेटलमेंट जेल’—सोलापुर कारावास की तारें काटी गईं और इन समुदायों को "विमुक्त" किया गया। यह कैसी विडंबना है—अंग्रेज़ों ने इन्हें "Notified Criminal Tribes" घोषित किया और आज़ाद भारत ने उस ‘नोटिफाइड’ शब्द के आगे एक "D" जोड़ दिया। यानी अब ये हो गए De-notified Tribes (DNTs)। यही है आधी रात की अधूरी आज़ादी की पूरी कहानी। देश भले ही आज़ाद हो गया हो, लेकिन इन लाखों लोगों के लिए आज़ादी 5 साल देर से आई, वो भी तब, जब बाकी भारत स्वतंत्रता के रंग में सराबोर हो चुका था।
(नोट - प्रस्तुत आलेख में व्यक्त उद्गार लेखक के निजी हैं, इसका द फॉलोअप से कोई संबंध नहीं है)
