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RSS प्रमुख की 75 साल की बात पर सियासत तेज, क्या मोदी पर भी लागू होगी ये परंपरा?

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व्यंकटेश पांडेय 

RSS प्रमुख मोहन भागवत का हाल में दिया गया बयान चर्चा में है। जिसमें उन्होंने 75 की उम्र के बाद दूसरों को मौका देने की बात कही है। इस बयान ने देश की सियासी हलचलों को हवा दे दी है और ये बयान जंगल में आग की तरह फैल रहा है। भागवत ने भले ही किसी का नाम न लिया हो, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस साल सितंबर में 75 साल के हो जाएंगे। यहीं वजह है कि इस बयान को सीधे नरेंद्र मोदी से जोड़कर देखा जा रहा है। दरअसल बाजेपी में 75 की उम्र पार कर चुके नेताओं को किनारे करने की एक अघोषित परंपरा लगभग एक दशक पुरानी है। तो ऐसे में ये सवाल उठना लाजमी है कि क्या 75 की परंपरा अब प्रधानमंत्री पर भी लागू होगी? या फिर मोदी परंपरा को तोड़ कर अपने राजनीतिक भविष्य को खुद परिभाषित करेंगे? क्योंकि याद कीजिए साल 2016 यूपी के मुरादाबाद में नोट बंदी के बाद दिया गया भाषण का हिस्सा जिसमें प्रधानमंत्री मोदी ने एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा था कि हम तो फकीर आदमी हैं झोला लेके चल पड़ेंगे। सवाल तो इसके सच होने का भी है।

आरएसएस प्रमुख ने 9 जुलाई को राम जन्मभूमि आंदोलन के प्रेरक दिवंगत मोरोपंत पिंगले पर लिखी पुस्तक के विमोचन के लिए आयोजित एक कार्यक्रम में ये बात कही। अब भागवत का यह बयान महज़ एक सामान्य बात भर नहीं, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस साल 17 सितंबर को 75 साल के हो जाएंगे। एक दशक पहले यानी साल 2014 में जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व देश में सरकार बनी थी, तब एक अघोषित परंपरा बनाई गई कि जिनकी उम्र 75 साल हो गई, वो रिटायरमेंट ले लेते हैं। यहीं वजह रही थी कि लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी समेत कई दिग्गज और वरिष्ठ नेताओं को मंत्री मंडल में जगह नहीं दी गई थी, और बाकायदा मार्गदर्शक मंडल में डाल दिया गया था। इतना ही नहीं उस समय तो ये भी कहा जाने लगा था कि '75' हो  गए क्या, दिल्ली की तरफ मत देखिए। 

ये बातें केवल कहने भर तर सीमित नहीं रहीं। नई नवेली सरकार के अभी दो साल पूरे ही हुए थे कि   कलराज मिश्रा, नजमा हेपतुल्ला को मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना पड़ा। वजह ये थी कि ये दोनों नेता 75 साल के हो गए थे। संयोग ऐसा है कि इस वर्ष मोहन भागवत और प्रधानमंत्री मोदी दोनों 75 साल के हो रहे हैं। ऐसे में आया भागवत का बयान चर्चा में तो आना ही था।   बहरहाल भागवत का ये बयान राजनीतिक गलियारों में नई बहस का हिस्सा बन गया है और 75 की बहस को नए सिरे फिर से जन्म दे दिया है।

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