आनंद सिंह
वह तारीख थी 7 अप्रैल, 2026 की। सुबह 10 बजे का वक्त था। टाटानगर रेलवे जंक्शन के प्रांगण में जिस स्थान पर यात्री ट्रेनों की लेटलतीफी के खिलाफ धरना दिया जाना था, उस स्थान को रस्सियों से घेर दिया गया था। उस घेरे के अंदर रेलवे सुरक्षा बल के हथियारबंद जवान तैनात थे। कहा गया कि यहां पर धरना नहीं होगा। आप लोगों को धरना देना है तो दाहिनी तरफ, 200 मीटर दूर, जहां रेलवे का इंजन खड़ा है, वहां जाइए। वहीं जाकर धरना दीजिए। एक रात पहले ही रेलवे के अफसरों ने वह धरनास्थल तय किया था। रात भर में ऐसा क्या हो गया कि धरना स्थल ही बदला जा रहा था? इसका जोरदार विरोध हुआ। जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय के समर्थकों ने जोरदार नारेबाजी की।

माथे पर एक रुमाल रख कर सरयू राय चिलचिलाती धूप में
एक पल को लगा कि कुछ अप्रिय घटित हो जाएगा लेकिन तभी विधायक सरयू राय आए और उन्होंने चीजों को समझने के बाद समर्थकों को शांत कराया। फिर जो हुआ, वह इतिहास है। 76 साल की उम्र में, माथे पर एक रुमाल रख कर सरयू राय चिलचिलाती धूप में ही धरना पर बैठ गए। उनके साथ जितने लोग थे, सभी धरना पर बैठ गए। एक टेंट नहीं, एक कनात नहीं। ऊपर से आग के गोले बरसाते सूर्यदेव। नीचे सरयू राय और उनसे प्रेम करने वाले समर्थकों का हुजूम! 7 अप्रैल को रेलवे प्रशासन ने ब्रिटिश इंडिया राज की याद दिला दी। मैंने जो ब्रिटिश राज के बारे में पढ़ा है, उसमें भी इस स्तर का ही ‘अत्याचार’ होता था। धरनास्थल को आरपीएफ के जवानों ने घेर रखा था-गोया लोग यहां उपद्रव करने जमा हुए हों! रेल प्रशासन की इस नासमझी और शुद्ध घटिया आचरण का सबने विरोध किया।
ट्रेनों की लेटलतीफी के खिलाफ हस्ताक्षर अभियान
यह बेहद तीखा विरोध था। 7 अप्रैल की सुबह 10 बजे धरना-भाषण का कार्यक्रम शुरु हुआ और बाकायदा अपराह्न एक बजे तक चला। सूर्यदेव सभी का इम्तिहान ले रहे थे लेकिन सरयू राय से प्यार करने वाले एक भी इंसान ने धरनास्थल से हटना मुनासिब नहीं समझा। तब मैंने देखा कि 76 साल की उम्र में भी सरयू राय किस जीवटता से डटे हैं। तीन घंटे लगातार बैठे रहे। एक बार भी उठे नहीं। पसीना पोंछते रहे। पानी पीते रहे, पर टस से मस न हुए। उनकी जीवटता वहां मौजूद सभी लोगों ने देखी। साथी वक्ताओं ने इस बात का अपने भाषणों में जिक्र भी किया। तारीख बदली। 26 अप्रैल 2026 की तारीख आई। ट्रेनों की लेटलतीफी के खिलाफ हस्ताक्षर अभियान की घोषणा पहले ही कर दी गई थी। तैयारियों के बीच रेल यात्री संघर्ष समिति के संयोजक शिवशंकर सिंह और जदयू के महानगर अध्यक्ष अजय कुमार एक बड़े रेल अफसर से मिलने गए। मकसद था-हस्ताक्षर अभियान के लिए जगह लेना। उस बड़े अफसर ने इन दोनों से तमीज से बातचीत नहीं की। यह स्थान नहीं मिलेगा, यह स्थान नहीं मिलेगा, यहां संभव नहीं है...यही सब बोला गया। ट्रेनों की लेटलतीफी पर कहा गया कि उनके हाथ में कोई जादू की छड़ी नहीं है कि एक बार घुमा दें और सारी ट्रेनें राइट टाइम हो जाएं।
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रेलवे के अफसरों की हठधर्मिता दूर नहीं
बातचीत का यह सिलसिला जल्द ही खत्म हो गया। अंत में यही तय हुआ कि जहां 7 अप्रैल को धरना दिया गया था, वहीं हस्ताक्षर अभियान चलेगा। 26 अप्रैल को उसी स्थान पर हस्ताक्षर अभियान चला भी। उस बातचीत के कड़वे दौर को स्मरण कर शिवशंकर सिंह ने कहा भी कि कहीं ऐसा न हो कि उन्हें उस बड़े अधिकारी के खिलाफ ही मोर्चा न खोलना पड़ जाए। फिर सरयू राय ने भी इस प्रसंग को शिद्दत से उठाया और दो टूक कहा कि रेलवे अधिकारियों की हठधर्मिता चिंताजनक है। रेलवे के अफसरों को यात्रियों के साथ सहानुभूति से पेश आना चाहिए। रेलवे के अफसरों की हठधर्मिता दूर नहीं हुई तो आंदोलन की दिशा बदलनी पड़ेगी। जब हस्ताक्षर अभियान चलाने की घोषणा हुई तो समिति के संयोजक और अन्य साथी रेलवे के वरिष्ठ अधिकारी से मिलने गए और उन्हें सूचित किया कि हम लोग प्लेटफार्म के बाहर बैठेंगे, हस्ताक्षर अभियान चलाएंगे। लेकिन उक्त जिम्मेदार अफसर का रवैया बेहद नकारात्मक था। उन्होंने सही तरीके से बात नहीं की। हर बात पर वह ना-नुकुर करते रहे। रेलवे को पता होना चाहिए कि हम लोग यहां अनुशासित तरीके से बैठे हैं। यह हमारा निर्णय है। अगर हम तय कर लेंगे कि हस्ताक्षर अभियान प्लेटफार्म पर चलाना है तो कोई रोक नहीं सकेगा। इसलिए रेलवे के अधिकारी कोई गुमान न पालें। आंदोलन का अगला दौर आपके लिए बेहद तकलीफदेह होगा। हमें रेलवे की फोर्स रोक नहीं पाएगी।
मालढुलाई कर हम लोग सबसे ज्यादा पैसे कमा रहे
रेलवे अधिकारी का यह कहना कि उनके पास कोई जादू की छड़ी नहीं कि एक दिन में ट्रेन को सही समय पर चला देंगे, ऐसे अधिकारी के बारे में किस संज्ञा और विशेषण का इस्तेमाल किया जाए? चक्रधरपुर डिवीजन में ही यात्री ट्रेनें क्यों लेट से चल रही हैं? इन्हें लेट चलाने और मालगाड़ी को आगे बढ़ाने के पीछे क्या स्वार्थ है रेलवे का? क्या आप रेल मंत्री को बताना चाहते हैं कि सबसे ज्यादा मालढुलाई कर हम लोग सबसे ज्यादा पैसे कमा रहे हैं? अगर आप प्रमोशन पाकर आगे बढ़ना चाहते हैं, यही आपका अगर ध्येय है तो यह चकनाचूर हो जाएगा। हम लोग आपका रवैया और आपकी कार्यशैली रेलवे बोर्ड और रेल मंत्रालय तक पहुंचाएंगे। बताएंगे कि रेलवे में कैसे अफसरों को बहाल किया गया है जो जनता के प्रति कैसी सोच रखते हैं, कैसी दुर्भावना रखते हैं।
फिर तारीख बदली। 27 अप्रैल 2026 को रेलवे के सीनियर डीसीएम चक्रधरपुर से टाटा आए। इस हस्ताक्षर अभियान का प्रेशर कितना तगड़ा हुआ, इसे आप सीनियर डीसीएम के शब्दों में ही समझ सकते हैं। उन्होंने कहाः यह तय किया गया कि दोपहर 2 बजे मुझे टाटानगर पहुंचना है। उस वक्त चक्रधरपुर से कोई ट्रेन नहीं थी। मीडिया से जरूरी बातें करनी थी। मैं बाई रोड आया।

हस्ताक्षर अभियान का असर रेलवे पर कितना
इस एक बयान से यह पता चलता है कि 7 अप्रैल और 26 अप्रैल के क्रमशः धरना कार्यक्रम और हस्ताक्षर अभियान का असर रेलवे पर कितना पड़ा। सीनियर डीसीएम रेलवे की उपलब्धियां गिनाते रहे, प्रेस कांफ्रेंस में पहुंचे पत्रकारों के दनादन पूछे जाने वाले सवालों को डक करते रहे। कोई जवाब हो तो आदमी दे! वह यही बताने के लिए चक्रधरपुर से टाटानगर आए थे कि रेलवे की पंक्चुअलिटी 35 प्रतिशत से बढ़ कर 65-70 प्रतिशत पर आ गई है। यह तो वह चक्रधरपुर में बैठ कर भी कर सकते थे। प्रेसनोट जारी कर सकते थे। हर बार वह थोड़े ही टाटानगर आकर प्रेस कांफ्रेंस करते हैं। वह टाटानगर इसलिए आए क्योंकि सरयू राय के नेतृत्व में रेल यात्री संघर्ष समिति ने मात्र दो प्रदर्शनों में इतना ज्यादा प्रेशर क्रिएट कर दिया कि उन्हें आना पड़ा। पहले ही दिन से सरयू राय कहते रहे हैं कि आप ट्रेन को टाटानगर समय से पहुंचाइए, टाटानगर से समय से खोलिए। इसके अलावा कोई मुद्दा है ही नहीं। यह टीस उन्हें इसलिए भी महसूस हुई, क्योंकि कई बार उन्हें चांडिल में उतर कर अपने साधन से जमशेदपुर आना पड़ा।
जबूरी ऐसी कि वह कुछ बोल नहीं सकते
वंदे भारत जैसी ओवर रेटेड ट्रेन में मैं भी दो घंटे से ज्यादा फंसा हूं। चांडिल तक ट्रेन बिफोर थी। चांडिल से टाटानगर तक पहुंचने में हमें दो घंटे से ज्यादा का वक्त लगा। तो, यह जनता से जुड़ा मुद्दा है। आम जनता इससे सीधे-सीधे प्रभावित हो रही है। सरयू राय आम लोगों के मुद्दे उठाने के लिए ही जाने जाते हैं। रेलवे को अब समझ में आ गया होगा कि सरयू राय अगर 42 डिग्री तापमान में नीले गगन के तले, पसीने में तर-बतर होकर भी बिना उठे तीन घंटे तक आंदोलन कर सकते हैं तो उनमें वह जज्बा भी है, वह करिश्माई नेतृत्व भी है कि वो सीनियर डीसीएम को सड़क मार्ग से टाटानगर स्टेशन भी आने के लिए मजबूर कर सकते हैं-बेशक प्रेस कांफ्रेंस करने के लिए। यह वो दबाव है जो रेलवे पर तारी है, लेकिन मजबूरी ऐसी कि वह कुछ बोल नहीं सकते!