विष्णु नारायण / पटना
पूर्णिया के सांसद हैं राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव। जिन्हें हाल फ़िलहाल 30-31 साल पुराने मामले में गिरफ़्तार किया गया। फिर जब बेल या हिंदी में कहें तो जमानत मिली तो किन्ही और मामलों में गिरफ़्तार किया गया। मीडिया के माध्यम से उनकी गिरफ्तारी में खासा बज रहा- वो ख़ुद भी जानते-समझते हैं कि सुर्खियां कैसी बटोरी जाती हैं। हम उस पर नहीं जा रहे, न ही हम इस पर जा रहे कि उन्हें क्यों गिरफ़्तार किया गया? पप्पू यादव कोई संत नहीं हैं, सियासत में अब संत नहीं बचे- उन पर पूर्व में भी कई मामले दर्ज हुए हैं- कई को लेकर उन्होंने सजा काटी तो कई में उन्हें बेल मिली, लेकिन मूल सवाल यह है कि कैसे एक मामले को निपटाने और किसी एंड तक पहुंचने में ज्यूडिशियरी को 30-31 साल लग जाते हैं- वो
कहावत तो आपने सुनी ही होगी कि Justice Delayed is Justice Denied- मतलब यहां कई बार इतना डिले (देरी) हो जाती है कि पीड़ित और आरोपी दोनों ही दुनिया से रुखसत हो जाते हैं- हमेशा कहा जाता है कि अब सब कुछ त्वरित गति से होगा लेकिन फिर वही- नौ दिन चले अढ़ाई कोस पुलिस समन लेकर चलती है लेकिन जिसतक पहुंचना है उसतक नहीं पहुंच पाती, जबकि वो शख्स Y श्रेणी की सुरक्षा में रहता है- संसद का सदस्य है, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के साथ मंच साझा करता है- राज्यपाल से गाहेबगाहे मिलता रहता है- है ना मजेदार मामला? खबर तो यह है कि पप्पू यादव को बेल मिल गई है, जिस बेल को लेकर कभी सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस कह गए कि Bail Is Rule And Jail Is An Exception
- हिंदी में कहें तो ‘जमानत नियम है और जेल अपवाद’ - हालांकि कई राजनीतिक कैदियों मसलन उमर खालिद, शरजील इमाम, खालिद सैफी, नताशा नारवाल और इशरत जहां जैसों के लिए नियम - कायदे - कानून बदल जाया करते हैं- जस्टिस जब अपनी कुर्सी पर नहीं रहते तो इंटरव्यू देते फिरते हैं लेकिन कुर्सी तो फिर कुर्सी है- तब आप लार्जर सिस्टम के हिस्से भर होते हैं। बहरहाल, अब पप्पू यादव थोड़ी ही देर में बाहर होंगे- उन्हें अन्य मामलों में भी बेल मिल गई है, लेकिन बेल और जेल के खेल ने इंडियन ज्यूडिशियरी और ओवरऑल सिस्टम की पोलपट्टी तो खोलकर रख ही दी है- बर्दाश्त कीजिए और क्या कीजिएगा???

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