द फॉलोअप डेस्क
एक माता-पिता ने बड़े प्यार से अपने बेटे को दो-दो नाम दिए लेकिन स्कूल में उसे तीसरा नाम मिला और दुनिया ने उसे चौथे नाम से जाना। जिसने अपने पिता की हत्या के बाद किताबें छोड़ तीर-कमान उठा लिए। जो जंगलों का मसीहा बना, जो अपने लोगों का रक्षक बना। वो इनसान जिसने न केवल एक आंदोलन खड़ा किया, बल्कि एक राज्य बनाकर इतिहास रच दिया। यह कहानी है शिबू सोरेन की, दिशोम गुरु की। अब दिशोम गुरु नहीं रहे। 81 वर्ष की उम्र में उन्होंने अंतिम सांस ली और साथ ही एक युग का अंत हो गया. एक ऐसा युग जिसमें आदिवासी चेतना ने पहली बार देश की सत्ता के गलियारों तक अपनी आवाज पहुंचाई।
27 नवंबर 1957, जब झारखंड के रामगढ़ जिले के एक छोटे से गांव नेमरा में एक आदर्श शिक्षक, मास्टर सोबरन सोरेन की जंगल में बेरहमी से हत्या कर दी गई। वो आदिवासी शोषण के खिलाफ खड़े होते थे। सूदखोर, शराब माफिया और दलाल उनसे खफा थे ऐसे में उन्होंने मास्टर साहब को रास्ते से हटा दिया। उनके बेटे की उम्र तब सिर्फ 13 साल थी। नाम था शिवचरण स्कूल में पढ़ने वाला एक सीधा-सादा लड़का। लेकिन उस दिन कुछ टूट गया, और साथ ही कुछ बन भी गया। अपने पिता के खून से लथपथ सपनों को शिवचरण ने जमीन पर नहीं गिरने दिया, बल्कि उन्हें अपनी आत्मा में समेट लिया और बन गया शिबू सोरेन।
शिबू ने देखा कि कैसे उनके लोगों से उनकी ही जमीन, उनकी ही फसल छीनी जाती है। ब्याज पर अनाज देकर महाजन पूरे गांव को गुलाम बना लेते थे। यही से शुरू हुआ उनका पहला संघर्ष, धनकटनी आंदोलन। "जिसने बोया, वही काटेगा" ये नारा बन गया और क्रांति की चिंगारी जल उठी। शिबू सोरेन तीर-कमान के साथ गांव-गांव घूमने लगे। उन्होंने संगठन बनाया, संथाल नवयुवक संघ। एक दिन जब महाजनों के गुंडों ने उन्हें घेर लिया, तो उन्होंने अपनी जान बचाने के लिए उफनाई बराकर नदी में बाइक समेत छलांग लगा दी। लोगों को लगा कि शिबो सोरेन नहीं बचेंगे. उनकी बाइक तो डूब गई, लेकिन उन्होंने उफनाई बनाकर नदी पर कर ली. लोगों ने इसे चमत्कार माना तब से और तब से लोग उन्हें कहने लगे दिशोम गुरु यानी देश का गुरु.
शिबू सोरेन अब सिर्फ नेता नहीं, आदिवासियों के भगवान बन चुके थे। 1972 में बिनोद बिहारी महतो और एके राय के साथ मिलकर उन्होंने एक नई पार्टी बनाई झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM)। झारखंड के लिए अलग राज्य की मांग को लेकर शुरू हुआ यह आंदोलन अब राजनीतिक शक्ल लेने लगा था। कई मुकदमे हुए, गिरफ्तारी हुई, जेल भी जाना पड़ा यह सबकुछ दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने सहा। लेकिन वह रुके नहीं। 1980 में पहली बार लोकसभा पहुंचे। फिर 1989, 1991, 1996 और हर बार संसद में एक आदिवासी नेता की आवाज गूंजती रही।
साल 2000 में जब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी, शिबू सोरेन ने चेतावनी दी "अगर झारखंड नहीं बना, तो कोयला नहीं निकलेगा।" ऐसे में सरकार को झुकना पड़ा, और 15 नवंबर 2000 को झारखंड एक अलग राज्य बन गया।
झारखंड भले ही शिबू सोरेन की अगुवाई और वर्षों की जद्दोजहद से बना हो, लेकिन जब राज्य के पहले मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने की बारी आई किस्मत ने फिर से उन्हें इंतज़ार थमा दिया। राजनीतिक गणित में बीजेपी को बहुमत मिला और बाबूलाल मरांडी झारखंड के पहले मुख्यमंत्री बने। वही शिबू सोरेन, जिनकी आवाज ने केंद्र को झुकने पर मजबूर किया था, सत्ता से एक बार फिर दूर रह गए।
लेकिन असली तूफान उनकी ज़िंदगी में 2004 में आया जब देश के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह थे और शिबू सोरेन को केंद्र सरकार में कोयला मंत्री की अहम जिम्मेदारी सौंपी गई थी। उसी समय झारखंड में बीजेपी की सरकार थी और केंद्र में बीजेपी विपक्ष में। राजनीतिक घमासान के बीच तीन दशक पुराना एक जख्म फिर से उभर आया।
ये मामला था 23 जनवरी 1975 का जब सूदखोरों और आदिवासियों के बीच टकराव हुआ था और 11 लोगों की जान गई थी। आरोप लगे कि इस संघर्ष की आग शिबू सोरेन ने ही भड़काई थी। उस घटना के सिलसिले में 1986 में जामताड़ा की अदालत ने उन्हें आत्मसमर्पण का आदेश दिया था लेकिन उन्होंने सरेंडर नहीं किया।
अब, 2004 में अदालत ने कहा कि पुराने आदेश पर कोई अमल नहीं हुआ, इसलिए 17 जुलाई को फिर से गैर-जमानती वारंट जारी हुआ। बस, यहीं से शुरू हुई एक नई मुश्किलों की कहानी। कोयला मंत्री रहते हुए उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू हो गई और इस्तीफे का दबाव बढ़ने लगा।
18 जुलाई को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से उनकी मुलाकात हुई। मुलाकात सिर्फ शिष्टाचार की नहीं थी यह उस विश्वास के टूटने का क्षण था जो वर्षों की राजनीति से जुड़ा था। प्रधानमंत्री ने उन्हें इस्तीफा देने का सुझाव दिया। फिर 20 जुलाई को अदालत ने शिबू सोरेन को भगोड़ा घोषित कर दिया और उस वक्त भी वो केंद्र सरकार में मंत्री थे।
ये किसी नेता की नहीं, बल्कि एक आंदोलनकारी की प्रतिष्ठा पर गिरी गहरी चोट थी। संसद के गलियारों में हंगामा मच गया। शिबू सोरेन ने चुपचाप अपने बेटे हेमंत सोरेन के हाथों अपना इस्तीफा भिजवाया, कोर्ट में आत्मसमर्पण किया और जेल चले गए।
लेकिन शिबू सोरेन टूटने वालों में से नहीं थे। एक महीने बाद जमानत मिली और वो फिर से बाहर आए। केंद्र सरकार ने उन पर फिर से भरोसा जताया और एक बार फिर उन्होंने कोयला मंत्री के तौर पर शपथ ली। मगर मुकदमे अभी खत्म नहीं हुए थे, संघर्ष की आग अभी बुझी नहीं थी। 2006 में अपने ही पूर्व सचिव शशिनाथ झा की हत्या के आरोप में उन्हें उम्रकैद मिली। पर 2007 में बरी कर दिए गए। 2008 में चिरूडीह केस से भी वह मुक्त हुए।
गुरुजी सबसे पहले 2005 में मुख्यमंत्री बने. लेकिन फिर उन्हें 9 दिन में इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद साल 2008 में वह दोबारा मुख्यमंत्री बने लेकिन उस समय वह विधायक नहीं थे. ऐसे में उपचुनाव हुए तमाड़ विधानसभा सीट से उन्होंने चुनाव लड़ा लेकिन वह हार गए और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। इसकें बाद 2009 में तीसरी बार सीएम बने पर फिर बहुमत नहीं बचा पाए. ऐसे में उन्हें 2010 में इस्तीफा देना पड़ा और राष्ट्रपति शासन लग गया।
इसके बाद उन्होंने धीरे-धीरे सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली। उनका बेटा हेमंत सोरेन उनके सपनों को आगे बढ़ाता रहा। झारखंड का मुख्यमंत्री बना, वही जो आज भी है। लेकिन अब उसके सिर से एक पिता का साया नहीं, बल्कि पूरे झारखंड की एक परछाईं उठ चुकी है। शिबू सोरेन अब नहीं हैं पर उनका संघर्ष, उनका आंदोलन, और उनकी दी हुई चेतना अब भी झारखंड की मिट्टी में सांस ले रही है। उन्होंने सिर्फ राज्य नहीं बनाया उन्होंने एक पहचान दी। उनके जाने से एक युग समाप्त हुआ है लेकिन उन्होंने जो जलाया था आदिवासी अस्मिता का मशाल, वो आज भी जल रही ह और जलती रहेगी।
