logo

सम्मेद शिखर विवाद : केंद्र-राज्य सरकार आदिवासियों की भावनाओं से कर रहे खिलवाड़

671.jpg

द फॉलोअप डेस्क
झारखंड के गिरिडीह स्थित सम्मेद शिखर पारसनाथ पहाड़ी (Sammed Shikhar Parasnath Hill) का विवाद खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है। पर्यटन स्थल बनाने को लेकर पहले जैन समुदाय ने देश भर में विरोध प्रदर्शन किया। अब इस पहाड़ को आदिवासी समुदाय अपना बता रहे हैं। इसको लेकर ही मधुबन में 10 जनवरी को मरांग बुरु धर्मक्षेत्र की रक्षा एवं अधिकार को लेकर पारसनाथ बचाओ आंदोलन के बैनर तले आदिवासी-मूलवासियों की महाजुटान रैली हुई। रैली के मद्देनजर जिला एवं पुलिस प्रशासन ने पूरे क्षेत्र में सुरक्षा के व्यापक प्रबंध किये थे। रैली को देखते हुए मधुबन बाजार बंद रहा। हालांकि, चप्पे-चप्पे पर पुलिस बल की तैनाती थी।

केंद्र-राज्य सरकार का पुतला दहन
रैली की अगुवाई विभिन्न राजनीतिक दलों के स्थानीय आदिवासी नेताओं ने किया। इनमें जेएमएम के वरिष्ट विधाध्यक लोबिन हेम्बम, पूर्व सांसद सालखन मूर्मु, सिकंदर हेम्ब्रम, अर्जुन मंराडी और अरविन्द किस्कू आदि शामिल रहे। मुधबन स्थित फुटबॉल मैदान से निकल कर रैली बाजार का भ्रमण करते हुए पर्वत मार्ग तक गई। यहीं, केंद्र सरकार और झारखंड सरकार का पुतला दहन किया गया। आदिवासी नेताओं ने दोनों सरकार पर आदिवासियों की भावनाओं की उपेक्षा करने का आरोप लगाया।

आदिवासियों का पवित्र स्थल
इस महाजुटान में झारखंड समेत देश के कई भागों से आदिवासियों की जुटने की बात सामने आई। उनका कहना है कि पारसनाथ क्षेत्र उनके अराध्य धर्मगुरु मरांग बुरु जाहेर स्थल है। इस बात का उल्लेख भी सन 1956 के बिहार-हजारीबाग गजट में है। यहां फागुन माह की पहली तिथि को विशेष पूजा-अर्चना होती है। जिसमें देश ही नहीं बांग्लादेश और भूटान समेत अन्य देशों से आदिवासी समाज के लोग शामिल होने आते हैं। उनका कहना था कि शिखरजी को अपना बताने पर जो लोग आमादा हैं वह सही नहीं कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि इसमें कई गैर आदिवासी संगठनों के लोग भी शामिल हुए हैं।