द फॉलोअप, रांची
8 अप्रैल को राज्य के पेयजल स्वच्छता मंत्री योगेंद्र प्रसाद ने नेपाल हाउस स्थित विभागीय कार्यालयों का औचक निरीक्षण किया था। इस क्रम में उन्होंने सचिवालय कर्मियों को डांट और फटकार भी लगायी। कई तरह की चेतावनी दी। मंत्री के औचक निरीक्षण की तस्वीर और वीडियो मीडिया और सोशल मीडिया में भी खूब वायरल हुई। इससे सचिवालय से कर्मी काफी आहत हुए। अपने को अपमानित महसूस किया। गुस्सा भी भड़का। इसको लेकर झारखंड सचिवालय सेवा संघ के पदाधिकारियों ने पहले विरोध करने की दिशा में आम सहमति बनाने की कोशिश की। इस विषय पर खूब बहस और चर्चा हुई। फिर यह तय किया गया कि सचिवालय सेवा संघ मंत्री को पत्र लिख कर विरोध दर्ज कराएगा। लेकिन जब मंत्री को पत्र लिखा गया तो उसकी भाषा और विषय ही बदल गए।

झारखंड सचिवालय सेवा संघ के अध्यक्ष रितेश कुमार द्वारा पेयजल स्वच्छता मंत्री योगेंद्र प्रसाद को लिखे गए पत्र में पहले तो औचक निरीक्षण की खूब प्रशंसा की गयी है। पत्र में कहा गया है कि पेयजल एवं स्वच्छता विभाग का निरीक्षण किया जाना अत्यंत प्रशंसनीय, दूरदर्शी और प्रेरणादायी है। इस प्रकार का नियमित एवं प्रभावी निरीक्षण न केवल प्रशासनिक कार्यप्रणाली में पारदर्शिता एवं जवाबदेही सुनिश्चित करता है, बल्कि योजनाओं के क्रियान्वयन की वास्तविक स्थिति एवं जवाबदेही सुनश्चित करता है। इससे कार्यों में गति, गुणवत्ता एवं अनुशासन बना रहता है। विभागीय तंत्र में उत्तरदायित्व की भावना भी सुदृढ़ होती है। साथ ही ऐसे अवसरों पर कार्यरत कर्मियों को अपने कार्यों, नवाचारों एवं जमीनी स्तर की वास्तविकताओं को सीधे मंत्री के समक्ष प्रस्तुत करने का अवसर प्राप्त होता है। यह प्रशासनिक सुदृढ़ीकरण की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण है।

पत्र में सचिवालय सेवा संघ ने दबे स्वर में सिर्फ इतना भर कहा कि मीडिया के माध्यम से निरीक्षणों का जो प्रस्तुतीकरण किया जाता है वह वास्तविक स्थिति का पूर्ण एवं संतुलित चित्र प्रस्तुत नहीं करता। इसे इस तरह प्रस्तुत किया जाता है कि विभागीय कर्मी अपने दायित्वों के प्रति उदासीन हैं। जबकि वास्तविकता में अधिकांश पदाधिकारी विशेष कर सचिवालय सेवा के पदाधिकारी सीमित संसाधन, पर्याप्त स्थान के अभाव एवं विभिन्न प्रशासनिक चुनौतियों के बावजूद पूर्ण निष्ठा से अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे हैं। वित्तीय वर्ष अंतिम तिमाही एवं बजट सत्र के दौरान 9-10 अवकाश के दिनों में भी निष्ठापूर्वक काम करते हैं। लेकिन मीडिया द्वारा एक पक्षीय चित्रण से पदाधिकारियों का कार्य मनोबल प्रभावित होता है। हालांकि सवाल यह भी है कि संघ यह जानने की कोशिश क्यों नहीं किया कि मीडिया को वीडिओ और प्रेस रिलीज कौन उपलब्ध कराता है।
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अंत में चार मांगों को मंत्री के समक्ष रख कर संघ अपने अपमान को भूल गया
-विभाग में पदाधिकारियों एवं कर्मचारियों के लिए सम्मानजनक एवं सुव्यवस्थित बैठने की व्यवस्था हो। संचिकाओं के संधारण की समुचित व्यवस्था भी।
-पदाधिकारियों को आवश्यक विभागीय प्रशिक्षण एवं नव नियुक्त सहायक प्रशाखा पदाधिकारियों को वेतन का भुगतान नहीं हो रहा है।
-प्रोन्नत प्रशाखा पदाधिकारियों को छह माह से वेतन भुगतान लंबित है, जिसे सात दिनों के अंदर शुरू कराया जाए।
-अवकाश स्वीकृति के मामलों को अनावश्यक रूप से महीनों तक लंबित रखा जाता है।
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