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हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी झाप्रसे अधिकारियों को प्रोन्नति मिलने की 5 मई तक संभावना नहीं

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फॉलोअप, रांची
झारखंड हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी झारखंड प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को पांच मई तक प्रोन्नति मिलने की संभावना नहीं है। क्योंकि कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार विभाग हाईकोर्ट का अंतिम फैसला आने तक किसी तरह के लफड़े से बचना चाहता है। मालूम हो कि हाईकोर्ट ने झारखंड प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को 2024 से पूर्व की वरीयता सूची के आधार पर प्रोन्नति देने पर लगी रोक को हटा लिया है। साथ ही हाईकोर्ट ने अंतिम फैसले के लिए 5 मई की तिथि निर्धारित की है। इस कारण बीच की लगभग डेढ़ महीने की अवधि में प्रोन्नति को लेकर जारी किचकिच से कार्मिक बचना चाहता है। वह अंतिम फैसले तक इंतजार कर लेने के मूड में बताया जाता है। लेकिन दुखद स्थिति यह है कि प्रोन्नति पर फैसला नहीं होने से कई अधिकारी बगैर प्रोन्नत हुए रिटायर करते जा रहे हैं। 31 मार्च को जल संसाधन विभाग से अशोक कुमार दास बगैर प्रोन्नति पाए रिटायर कर गए। इसी तरह प्रोन्नति पर विचार नहीं हुआ तो 30 जून को कैबिनेट में पदस्थापित संयुक्त सचिव अखलेश कुमार सिन्हा भी रिटायर कर जाएंगे।


क्या है पूरा मामला
बिहार से झारखंड के अलग होने के बाद अन्य सेवा के कर्मियों की तरह राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों का भी बंटवारा हुआ। राज्य प्रशासनिक सेवा के कई अधिकारी स्वाभाविक बंटवारे में झारखंड आए। उन्हें झारखंड कैडर मिला। उसके आधार पर अधिकारियों की एक वरीयता सूची बनायी गयी। बाद में वर्ष 2024 में कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार विभाग ने झाप्रसे अधिकारियों की एक वरीयता सूची बनायी। इस वरीयता सूची में वैसे अधिकारी जो म्युच्युअल अंडरस्टैंडिंग से बिहार से झारखंड आये, वरीयता सूची में नीचले पायदान पर डाल दिए गए। क्योंकि बिहार पुनर्गठन अधिनियम के प्रावधान में यही कहा गया है। लेकिन सरकार के इस फैसले के विरोध में म्युच्युअल अंडरस्टैंडिंग से झारखंड आए राधेश्याम प्रसाद, मंत्री डॉ इरफान अंसारी के रिश्तेदार सदात अनवर, रांची नगर निगम के अपर आयुक्त संजय हाईकोर्ट चले गए। हाईकोर्ट ने वरीयता सूची के आधार पर प्रोन्नति देने पर जून 2025 में रोक लगा दी। अब हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि 2024 की वरीयता सूची पर रोक जारी रहेगी, लेकिन सरकार चाहे तो उससे पूर्व की वरीयता सूची के आधार पर प्रोन्नति दे सकती है। अब झाप्रसे अधिकारियों का कहना है कि जो लोग हाईकोर्ट गए हैं, उनका नाम विचारण सूची में है ही नहीं। उन्हें कोर्ट के फैसले से न तो नुकसान हो रहा है और ना ही फिलहाल प्रोन्नति का लाभ। लेकिन उनसे वरीय अधिकारियों को प्रोन्नति का लाभ देने से रोकना अन्याय है। जबकि अपर सचिव से विशेष सचिव, संयुक्त सचिव से अपर सचिव में प्रोन्नति के लिए कई पद रिक्त हैं।

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