द फॉलोअप डेस्क
झरिया के पूर्व विधायक संजीव सिंह को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें नीरज सिंह हत्याकांड मामले में जमानत दे दी है। संजीव सिंह करीब 7 सालों से जेल में बंद थे और उनकी जमानत याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला उनके पक्ष में आया है।
पूर्व विधायक संजीव सिंह की ओर से बहस करते हुए सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता एमए नियाजी ने कहा कि नीरज हत्याकांड की जांच सरकार की दो एजेंसियों, सीआईडी और स्थानीय पुलिस, ने की थी। इस मामले में तीन अनुसंधानकर्ताओं ने जांच की।
इसके बावजूद, सभी महत्वपूर्ण तथ्यों को जानबूझकर अदालत से छुपाया गया, ताकि पूरे मामले को अपने अनुसार मोड़ा जा सके और संजीव सिंह को फंसाया जा सके। अधिवक्ता नियाजी ने अपनी दलील में कहा कि घटना की सबसे पहली जांच सराढेला थाना प्रभारी अरविंद कुमार ने की थी। उन्होंने 26 तारीख तक जांच की। इसके बाद चिरकुंडा थाना प्रभारी निरंजन कुमार तिवारी को जांचकर्ता नियुक्त किया गया। इस प्रकार, एक साथ दो अनुसंधानकर्ता जांच कर रहे थे। फिर, तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास के आदेश पर एसआईटी का गठन किया गया, जिसकी अगुवाई एडीजी सीआईडी अजय कुमार सिंह कर रहे थे।

इन सभी के बावजूद, सीआईडी के किसी भी अधिकारी को चार्जशीट का गवाह नहीं बनाया गया। कई महत्वपूर्ण तथ्यों को अदालत से छुपा लिया गया, जबकि सीआईडी ने संदिग्धों के स्केच भी जारी किए थे। आरोप पत्र में संजीव सिंह को घटनास्थल पर नहीं, बल्कि षड्यंत्रकारी के रूप में पेश किया गया। यह सवाल उठता है कि पुलिस ने आरोप पत्र में अभियुक्तों के स्वीकारोक्ति बयान को किस आधार पर शामिल किया, जबकि किसी गवाह ने न तो पुलिस के सामने और न ही अदालत में ऐसा कोई बयान दिया था, जैसा कि अनुसंधानकर्ताओं ने चार्जशीट में लिखा।
