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कुपोषण से लड़ाई में गुमला जिला प्रशासन की पहल, ग्रामीण क्षेत्रों में मोरिंगा सहजन के पौधे वितरित

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द फॉलोअप डेस्क
झारखंड के कई जिलों के साथ ही गुमला जिले में भी महिलाओं में कुपोषण एक गंभीर समस्या के रूप में सामने आ रही है। इस स्थिति को सुधारने के लिए जिला प्रशासन और राज्य सरकार लगातार प्रयास कर रही हैं। इसी दिशा में गुमला की डीसी प्रेरणा दीक्षित की पहल से ग्रामीण क्षेत्रों में मोरिंगा (सहजन) के पौधे वितरित किए जा रहे हैं। इसका उद्देश्य ग्रामीण लोगों को मोरिंगा का फल और पत्तियाँ सब्जी के रूप में सेवन करने के लिए प्रेरित करना है। स्थानीय लोगों ने बताया कि यदि इसे नियमित रूप से खाया जाए तो इसके कई स्वास्थ्य लाभ हैं। मोरिंगा, जिसे हिंदी में सहजन कहा जाता है, एक अत्यंत उपयोगी और औषधीय गुणों से भरपूर पौधा है। इसे “चमत्कारी वृक्ष” भी कहा जाता है क्योंकि इसके लगभग सभी भाग—पत्तियाँ, फलियाँ, फूल, बीज और छाल स्वास्थ्य के लिए लाभकारी हैं। भारत सहित कई उष्णकटिबंधीय देशों में इसकी खेती की जाती है।
मोरिंगा की पत्तियाँ पोषक तत्वों का भंडार हैं। इनमें प्रचुर मात्रा में प्रोटीन, कैल्शियम, आयरन, पोटैशियम और विटामिन A, C तथा E पाए जाते हैं। यही कारण है कि यह कुपोषण दूर करने में सहायक माना जाता है। इसकी पत्तियों का सेवन रक्त की कमी (एनीमिया) में लाभकारी होता है और यह रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी मजबूत करता है। मोरिंगा में शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं, जो शरीर में हानिकारक मुक्त कणों को नष्ट करते हैं। इसके नियमित सेवन से हृदय रोग, मधुमेह और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का जोखिम कम करने में मदद मिलती है। यह रक्त शर्करा और कोलेस्ट्रॉल के स्तर को नियंत्रित रखने में भी सहायक है।
सहजन की फलियाँ पाचन तंत्र के लिए लाभकारी होती हैं। इनमें मौजूद फाइबर कब्ज की समस्या को दूर करता है और आंतों को स्वस्थ रखता है। इसके फूलों का उपयोग पारंपरिक चिकित्सा में सूजन और सर्दी-खांसी के उपचार में किया जाता है। मोरिंगा के बीजों से निकाला गया तेल त्वचा और बालों के लिए अत्यंत उपयोगी होता है। यह त्वचा को पोषण देता है, झुर्रियों को कम करता है और बालों को मजबूत बनाता है। मोरिंगा का पौधा पर्यावरण के लिए भी लाभकारी है, क्योंकि यह तेजी से बढ़ता है और कम पानी में भी पनप सकता है। इस प्रकार मोरिंगा स्वास्थ्य, पोषण और पर्यावरण—तीनों दृष्टियों से अत्यंत गुणकारी है। गुमला जिले में डीसी प्रेरणा दीक्षित की पहल से यह पौधा ग्रामीणों के जीवन में स्वास्थ्य और पोषण के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है।

 

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