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गांव की दयनीय अर्थव्यवस्था को दूर करने के लिए बने प्रोफेसर, 200 टीचिंग स्टाफ में अकेला हो आदिवासी

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द फॉलोअप डेस्क
यदि मन में इच्छाशक्ति हो, तो इंसान क्या नहीं कर सकता है। एक ऐसे ही अदम्य व अटूट इच्छाशक्ति प्रेरणादायक कहानी हम आपको बताने जा रहा है, जो कोल्हान के चाईबासा जिले के मंझारी प्रखंड के पिछड़े गांव बरकुंडिया से जुड़ी है। यहां जन्मा एक युवक गांव की दयनीय अर्थव्यवस्था से इतना प्रभावित हुआ कि वह अच्छी पढ़ाई के दम पर इसी विषय में न केवल सर्वोच्च शैक्षणिक डिग्री पीएचडी (डॉक्टर ऑफ फिलोसोफी) हासिल की, बल्कि अब वह दिल्ली यूनिवर्सिटी के अंगीभूत ऑफ कैंपस कॉलेज सत्यवती कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर (इकॉनोमिक्स) के पद पर आसीन हैं। उस संघर्षशील व्यक्ति का नाम डॉ बलभद्र बिरुवा है। कहते हैं, गांवों की खस्ता अर्थव्यवस्था से प्रेरित होकर ही उनमें इस सब्जेक्ट के प्रति रूचि का आविर्भाव हुआ था और इस विषय में उन्होंने डॉक्टरेट कर डाला।

इस प्रतिष्ठित कॉलेज में डॉ बलभद्र बिरुवा असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। हालांकि वह अभी एडहोक श्रेणी में हैं। वह यहां भारतीय अर्थव्यवस्था समेत दुनिया की तमाम अर्थव्यवस्थाओं की शिक्षा देते हैं। वह यहां करीब 190 टीचिंग स्टाफ के बीच अकेले हो आदिवासी प्रोफेसर हैं, जो आदिवासी हो समुदाय को गौरवान्वित करता है।

बता दें कि प्रो डॉ बलभद्र बिरुवा ने संत जेवियर्स कॉलेज रांची से ग्रेजुएशन किया। वहीं, पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री उन्होंने जामिया मिलिया इस्लामिक यूनिवर्सिटी से ली है। जबकि डॉक्टरेट डिग्री डीयू (दिल्ली यूनिवर्सिटी) से पूरी की है।

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