द फॉलोअप डेस्क
भारत और अमेरिका के बीच घोषित नई ट्रेड डील को लेकर देश के भीतर विवाद गहराता जा रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच फोन पर हुई बातचीत के बाद इस समझौते की घोषणा तो हो गई, लेकिन इसके ठोस ब्योरे अब भी धुंध में हैं। यही अस्पष्टता इस डील को लेकर सबसे बड़ा सवाल बनकर उभरी है।
अमेरिकी पक्ष जहां इस डील को “ऐतिहासिक” और अमेरिकी किसानों के लिए “अभूतपूर्व अवसर” बता रहा है, वहीं भारत सरकार की ओर से बयान बेहद सीमित और सावधानी भरे रहे हैं। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने 20 मिनट के संबोधन में मोदी-ट्रंप दोस्ती की तारीफ जरूर की, लेकिन यह साफ नहीं किया कि भारत ने असल में क्या-क्या रियायतें दी हैं।

जीरो टैरिफ का सवाल: क्या भारत ने अमेरिकी सामानों पर दरवाज़े खोल दिए?
अमेरिकी ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव जैमीसन ग्रीर ने खुलकर कहा है कि भारत “कई अमेरिकी औद्योगिक और कृषि उत्पादों पर टैरिफ शून्य कर देगा।” उनके अनुसार ड्राई फ्रूट्स, शराब, वाइन, फल-सब्जियां जैसे उत्पादों पर टैरिफ घटाकर शून्य किया जाएगा।
यहीं से विवाद की असली जड़ शुरू होती है। भारत ने अब तक कृषि को हर बड़े ट्रेड समझौते में “रेड लाइन” माना है। लेकिन इस डील में सरकार बार-बार कह रही है कि कृषि और डेयरी को सुरक्षित रखा गया है, जबकि यह नहीं बताया जा रहा कि कैसे और किन शर्तों के साथ।
ट्रेड एक्सपर्ट अजय श्रीवास्तव का कहना है कि जब तक यह साफ नहीं होता कि कौन-से उत्पाद बाहर हैं और कौन-से भीतर, तब तक यह मान लेना खतरनाक होगा कि भारतीय किसान सुरक्षित हैं। जीरो टैरिफ और नॉन-टैरिफ बैरियर खत्म होने का मतलब भारतीय कृषि के लिए गंभीर प्रतिस्पर्धा हो सकता है।
कृषि और डेयरी: सबसे बड़ा जोखिम
अमेरिका की कृषि व्यवस्था भारी सब्सिडी पर टिकी है। वहां के डेयरी और कृषि उत्पाद सस्ते पड़ते हैं, जबकि भारत में छोटे और सीमांत किसान पहले से ही लागत और बाजार के दबाव में हैं।
अगर अमेरिकी डेयरी प्रोडक्ट्स या प्रोसेस्ड फूड भारत में आसान एंट्री पाते हैं, तो इसका सीधा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। यही कारण है कि डेयरी को लेकर सरकार की चुप्पी सबसे ज्यादा सवाल खड़े कर रही है।
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, चावल, शुगर, सोयाबीन और डेयरी को इस डील से बाहर रखा गया हो सकता है, लेकिन न तो भारत सरकार और न ही अमेरिका ने इसकी आधिकारिक पुष्टि की है।
500 अरब डॉलर की खरीद: अव्यावहारिक प्रतिबद्धता?
डोनाल्ड ट्रंप का दावा है कि भारत ने अमेरिका से 500 अरब डॉलर के सामान खरीदने पर सहमति जताई है। यह आंकड़ा भारत की मौजूदा अमेरिकी आयात क्षमता से कई गुना अधिक है।
फिलहाल भारत अमेरिका से सालाना 50 अरब डॉलर से भी कम का आयात करता है। ऐसे में अगले पांच साल में इसे दस गुना बढ़ाना न केवल आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण है, बल्कि घरेलू उद्योगों के लिए भी खतरे की घंटी है।
कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने इसे “असंभव लक्ष्य” बताया है, जबकि राहुल गांधी ने सरकार पर आरोप लगाया कि “दबाव में देश को बेचा जा रहा है।”

रूसी तेल छोड़ने का दबाव: ऊर्जा सुरक्षा दांव पर?
इस डील का सबसे संवेदनशील पहलू है — रूस से तेल न खरीदने का संकेत। यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रूस से सस्ता तेल खरीदकर अपने आयात बिल को संतुलित किया था। अब ट्रंप का दावा है कि भारत अमेरिका और वेनेजुएला से तेल खरीदेगा। यह न सिर्फ महंगा विकल्प है, बल्कि भारत की रणनीतिक स्वायत्तता पर भी सवाल खड़ा करता है। रूस ने साफ कहा है कि उसे ऐसी किसी जानकारी की पुष्टि नहीं है। वहीं भारत सरकार ने भी इस मुद्दे पर कोई स्पष्ट बयान नहीं दिया है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत अमेरिकी दबाव में आकर रूसी तेल से दूरी बनाता है, तो पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर इसका सीधा असर पड़ेगा।
राजनीति और टाइमिंग: संयोग या रणनीति?
इस डील की घोषणा ऐसे वक्त पर हुई जब संसद में राहुल गांधी चीन सीमा विवाद पर सरकार को घेर रहे थे। लोकसभा में हंगामे के कुछ ही घंटों बाद ट्रंप की घोषणा ने पूरा नैरेटिव बदल दिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह डील घरेलू दबाव को कम करने और अमेरिका के साथ रिश्तों को रीसेट करने की रणनीति भी हो सकती है।
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फायदे भी हैं, लेकिन कीमत कितनी भारी?
सरकार का तर्क है कि 18% टैरिफ भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया से प्रतिस्पर्धी बनाता है और मैन्युफैक्चरिंग निवेश को बढ़ावा देगा। ‘चीन-प्लस-वन’ रणनीति में भारत को फायदा मिल सकता है। लेकिन सवाल यही है कि क्या यह फायदा कृषि, ऊर्जा और घरेलू उद्योगों की कीमत पर मिलेगा? भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर सबसे बड़ी समस्या यही है कि सवाल ज्यादा हैं, जवाब कम। जीरो टैरिफ, 500 अरब डॉलर की खरीद, रूसी तेल से दूरी और कृषि-डेयरी की सुरक्षा — इन सभी बिंदुओं पर सरकार की चुप्पी आशंकाओं को और गहरा कर रही है। जब तक समझौते का पूरा टेक्स्ट सामने नहीं आता, तब तक यह डील “ऐतिहासिक अवसर” से ज्यादा “आर्थिक जोखिम” के रूप में देखी जाती रहेगी।
