सूरज ठाकुर/साहिबगंज:
Jharkhand News: केवल 14 साल के जीत रक्षित की जिंदगी चारदीवारी में कैद हो गई है। पैर हैं लेकिन जीत कदम नहीं बढ़ा सकते। हाथ हैं, लेकिन वे सपने नहीं बुन सकते। पिछले 7 साल से इस छोटे से कमरे के फर्श पर बिछा गद्दा ही जीत की नियति बन गया है। जीत दरअसल, ड्यूशन मस्कुलर डिस्ट्राफी (Duchenne muscular dystrophy) नाम की दुर्लभ अनुवांशिक बीमारी (Rare genetic disease) से पीड़ित हैं। इस बीमारी की वजह से जीत चलना तो दूर, अपने पैरों पर खड़े भी नहीं हो सकते। बैठने के लिए भी उन्हें दीवार का सहारा चाहिए। जीत बोलते हुए हकलाते हैं। जीत की जिंदगी, पिता मुन्ना रक्षित के मदद के मोहताज है। जीत को जिंदा रखने के लिए लाखों की दरकार है। पिता के लिए यह रकम जुटाना असंभव है।
15 मई 2013 को बोरियो में हुआ था जीत का जन्म
जीत इतने असहाय हमेशा से नहीं थे। साहिबगंज जिला मुख्यालय से करीब 40 किमी दूर बोरियो प्रखंड के बोरियो बाजार स्थित बंगाली टोला में 15 मई 2013 को जीत का जन्म हुआ था। शुरुआत में सब ठीक था। होश संभालने के बाद जीत स्कूल भी जाते थे। वे बोरियो बाजार में ही क्यूमैक्स पब्लिक स्कूल में पढ़ते थे। सबकुछ ठीक चल रहा था, फिर वर्ष 2020 आया। पिता मुन्ना रक्षित समेत बाकी घरवालों ने गौर किया कि जीत छोटी सी सीढ़ी भी नहीं चढ़ पाते। चलते-चलते लड़खड़ाकर गिर जाते हैं। जीत चलते समय हाथ से अपने घुटने थाम लिया करते थे। स्कूल ने भी मुन्ना रक्षित से कह दिया कि आप जीत को ना भेजें।

दवा और फिजियोथैरेपी में लाखों का खर्चा होता है
मुन्ना रक्षित, जीत को तत्काल दुमका ले गये। वहां से उन्हें पश्चिम बंगाल के आसनसोल में हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. बी रॉय के पास भेज दिया गया। यहां से उन्हें मार्च 2020 में रांची के मेडिका अस्पताल भेजा गया और फिर यह कारवां रिम्स अस्पताल से होता हुआ सीएमसी वेल्लोर तक पहुंचा। वेल्लोर में डॉक्टरों ने पहली बार में यह कह दिया कि जीत नहीं जिएगा। आप दूसरे बच्चे की तैयारी करो।
एक ओर दवा और दुआ का दौर जारी था तो दूसरी ओर किसी ने मुन्ना को सलाह दी कि वे जीत को हिमाचल प्रदेश के मानव मंदिर लेकर जाएं। यहां फिजियोथैरेपी होती है। यहां साल में 3 बार जाना पड़ता है। प्रत्येक विजिट का खर्चा 60,000 रुपये है जो मुन्ना रक्षित के लिए जुटा पाना तकरीबन नामुमकिन है। इस बीच जीत की तकलीफ बढ़ती जा रही है। पैर पूरी तरह निष्क्रिय हो चुके हैं। हाथ भी पूरा नहीं उठता।

मुख्यमंत्री से मिली थी 40 हजार रुपये की रकम
जीत की जिंदगी की उम्मीद क्या है! सरकारी मदद। मुन्ना रक्षित उसके लिए काफी प्रयास कर चुके हैं। स्थानीय जिला प्रशासन से लेकर मुख्यमंत्री और राज्यपाल तक से जीत की जिंदगी बचाने की गुहार लगा चुके हैं। एक दफा मदद मिली थी, 40 हजार रुपये की। हालांकि, जीत के इलाज के लिए जितनी रकम चाहिए, उसमें 40 हजार रुपये की राशि ऊंट के मुंह में जीरा सरीखी है।
जीत रक्षित को दिव्यांगता का भी लाभ नहीं मिल रहा
जीत ना केवल एक दुर्लभ अनुवांशिक बीमारी से पीड़ित हैं, बल्कि दिव्यांग भी हैं। उन्हें आधुनिक सुविधाओं वाला मेडिकल बेड और स्वचालित व्हीलचेयर की तत्काल दरकार है। उन्हें दिव्यांगों को मिलने वाली सरकारी सहायता मिलनी चाहिए, लेकिन प्रशासनिक असंवेदनशीलता आड़े आती है। जीत के दिव्यांगता सर्टिफिकेट में ऐसी विसंगति है कि वे सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने से वंचित हो गये हैं।
महज 14 साल के जीत पिछले कई सालों से असहनीय पीड़ा से गुजर रहे हैं। घरवालों के लिए भी उनकी तकलीफ देखना मुश्किल होता जा रहा है। पिता मुन्ना रक्षित और उनकी बुजुर्ग मां वर्षों से किसी रिश्तेदार के यहां नहीं गए। दादी को अब भी उम्मीद है कि यदि सरकार जीत के मामले में संवेदनशीलता से संज्ञान ले तो उसकी जिंदगी आसान बनाई जा सकती है।
मस्कुलर डिस्ट्रॉफी के लिए सरकारी प्रावधान क्या हैं!
ऐसा भी नहीं है कि जीत के लिए सरकारी मदद का प्रावधान नहीं है। ड्यूशेन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी जैसी दुर्लभ अनुवांशिक बीमारी के इलाज में वित्तीय सहायता के उद्देश्य से स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की राष्ट्रीय दुर्लभ बीमारी नीति के तहत 50 लाख रुपये तक की आर्थिक मदद का प्रावधान है। झारखंड सरकार भी मुख्यमंत्री गंभीर बीमारी उपचार योजना के तहत 10 लाख रुपये तक की आर्थिक सहायता का प्रावधान करती है। हालांकि, यह विडंबना ही है कि जीत को अभी तक ये मदद नहीं मिली।