डेस्क:
2016-17 में शुरू की गई डोभा योजना पूरी तरह से फेल हो चुकी है। गांव का जलस्तर बढ़ाने और बरसात के बाद खेतों में पटवन की वैकल्पिक व्यवस्था करने के लिए गांव का पानी गांव व खेत का पानी खेत में रोकने के उद्देश्य से इस योजना की शुरुआत की गई थी। लेकिन इस योजना धरातल पर कम और कागज पर ज्यादा निर्माण हुआ है। मतलब डोभा निर्माण के नाम पर कागजी खानापूर्ति कर करोड़ों राशि की निकासी कर ली गई है।

पैसा निकाल लिया गया लेकिन निर्माण नहीं हुआ
प्रभात खबर में छपी खबर के अनुसार बीते 6 साल में राज्य सरकार ने पूरे राज्य में डोभा खुदवाने में करीब 900 करोड रुपए खर्च किए। लेकिन विभागीय कर्मचारियों व पदाधिकारियों की लापरवाही से योजना अपने उद्देश्य से भटक गई। आधे से ज्यादा डोभा बर्बाद हो गए। इधर बड़ी संख्या में योजना के तहत स्वीकृत डोभा बने ही नहीं लेकिन उनका पैसा निकाल लिया गया। यानी डोभा निर्माण में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हुई है।
900 करोड़ बर्बाद
सरकारी आंकड़ों की बात करें तो राज्य में पिछले 6 वर्ष में करीब 3.20 लाख डोभा निर्माण हुआ। कृषि विभाग की ओर से करीब 1.50 लाख और मनरेगा के तहत करीब 1.70 लाख डोभा का निर्माण कराया गया था। जिसे विभाग ने इस योजना पर करीब 400 करोड़ रुपए खर्च किए थे। जबकि मनरेगा के तहत दो बार निर्माण पर 500 करोड़ से अधिक की राशि खर्च की गई थी। यानी कि डोभा योजना के लिए सरकार ने कुल 900 करोड़ रुपए खर्च किए थे। जो पूरी तरीके से बर्बाद हो गयी है।

गलत जगह पर बने डोभा
प्रभात खबर में छपी एक खबर के मुताबिक गुमला जिले में तो 20 हजार डोभा गायब ही हो गया है। वहीं बड़ी संख्या में ऐसी जगह पर इसे बनाया गया हैं। जहां बरसात का पानी जाता ही नहीं। गलत जगह पर डोभा बनने से भी योजना फेल हो गई है और किसानों को इस योजना का लाभ नहीं मिल पाया है।