द फॉलोअप डेस्क
कोल्हान के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल MGM मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में व्यवस्था की परतें एक बार फिर उजागर गई हैं। दरअसल, अस्पताल में लापरवाही और संवेदनहीनता का एक और भयावह मामला सामने आया है। जिस मरीज को इलाज के लिए भर्ती कराया गया, वही 9 दिनों तक गायब रहा और अंततः उसका शव अस्पताल परिसर के भीतर कचरे के ढेर से बरामद हुआ। यह सिर्फ एक मौत नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की नाकामी का दस्तावेज है। क्या सुनील यादव की मौत सिर्फ एक हादसा है, या उस सिस्टम की नाकामी है जो इलाज का भरोसा देता है, लेकिन सुरक्षा तक सुनिश्चित नहीं कर पाता। बागबेड़ा के बाबाकुटी निवासी 45 वर्षीय सुनील यादव, जो पिछले 9 दिनों से लापता थे, उनका शव सोमवार शाम करीब 5.30 बजे अस्पताल परिसर स्थित कैथ लैब के समीप कचरे के ढेर से बरामद हुआ। शव की हालत ऐसी थी कि तेज दुर्गंध और मक्खियों के झुंड ने पहले ही इस त्रासदी की गवाही दे दी थी। हैरानी की बात यह है कि जिस मरीज के हाथ में अब भी आईवी कैनयुला लगा था, वह अस्पताल के भीतर परिसर में ही 9 दिनों तक पड़ा रहा और किसी की नजर उस पर नहीं पड़ी। इस मामले का खुलासा तब हुआ, जब कचरे के ढेर से उठ रही बदबू से परेशान एक चाय विक्रेता ने अस्पताल प्रबंधन को सूचना दी। कर्मचारियों ने मौके पर पहुंचकर जांच की, तो वहां एक सड़ा-गला शव मिला। पहचान करने पर पता चला कि वह 14 मार्च से लापता मरीज सुनील यादव हैं।
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इधर, शव मिलने की सूचना अस्पताल प्रबंधन की ओर से शाम लगभग 7 बजे परिजनों को दी गई। मौके पर पहुंचे परिजनों ने जमकर हंगामा किया। मृतक के बेटे अभय यादव ने आरोप लगाया कि पिता के गायब होने की सूचना देने के बावजूद अस्पताल प्रबंधन ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया। उन्होंने जब सीसीटीवी फुटेज दिखाने की मांग की, तो उसे ठुकरा दिया गया। मृतक के बेटे ने कहा कि अगर समय पर फुटेज दिखाया जाता, तो शायद हम उन्हें ढूंढ लेते और उनकी जान बच जाती। ऐसे में परिजनों का यह आरोप सीधे अस्पताल प्रशासन पर कई गंभीर सवाल खड़े करता है। दूसरी ओर शव मिलने के बाद जब सीसीटीवी फुटेज खंगाले गये, तो सुनील यादव 14 मार्च की रात अस्पताल के मुख्य गेट की ओर जाते नजर आए। आशंका है कि वे गार्ड रूम के पास गिरे होंगे, जहां उनकी मौत हो गई होगी। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि अगर मरीज मुख्य गेट तक पहुंचा, तो वहां तैनात सुरक्षाकर्मियों ने उसे रोका क्यों नहीं? अस्पताल में भर्ती मरीज 9 दिनों तक गायब रहा, फिर भी उसकी कोई खोजबीन क्यों नहीं हुई? अस्पताल परिसर से मरीज के गायब होने पर पुलिस को सूचना क्यों नहीं दी गई? गौरतलब हो कि एमजीएम में मरीजों के लापता होने और हादसे का शिकार होने का यह कोई पहला मामला नहीं है। हाल ही में एक HIV पॉजिटिव मरीज के चौथी मंजिल से कूदने से मौत हो गई थी। इससे पहले भी एक मरीज ने अस्पताल के बिल्डिंग से छलांग लगाकर जान दे दी थी।

विगत 8 मार्च को भर्ती बागबेड़ा निवासी अरुण प्रमाणिक भी अगले दिन रात में वार्ड से गायब हो गये थे, जो बाद में साकची कोर्ट के पास भटकते मिले। इसके अलावा बर्मामाइंस और घाटशिला के मरीजों के गायब होने की घटनाएं भी सामने आ चुकी हैं। वहीं, अब सुनील यादव की मौत के बाद अस्पताल प्रबंधन हरकत में आया है और नये नियम लागू किये जा रहे है। बताया गया कि अस्पताल में नये नियम लागू करते हुए रात 9 बजे के बाद मरीजों के लिए “नाइट कर्फ्यू” लगाया जायेगा। साथ ही अब बिना अटेंडर के मरीजों को बाहर जाने की अनुमति नहीं होगी। मरीजों के वॉशरूम जाने के लिए अटेंडर अनिवार्य होगा। जिन मरीजों के साथ परिजन नहीं होंगे, उन्हें नर्स की निगरानी में वॉशरूम ले जाया जायेगा। इसके अलावा अस्पताल की खिड़कियों में ग्रिल, स्लाइडिंग दरवाजों में लॉक और वॉशरूम तक भी निगरानी की व्यवस्था की जायेगी ऐसे में सवाल है कि क्या हर हादसे के बाद ही नियम बनेंगे, या कभी व्यवस्था पहले भी सिस्टम जागेगी? अस्पताल के अधीक्षक डॉ बलराम झा का कहना है कि मरीज के शव मिलने की घटना की जानकारी के बाद मामले की जांच की जायेगी कि आखिर कहां और किस स्तर पर लापरवही हुई है।