द फॉलोअप डेक्स
झारखंड मुक्ति मोर्चा के केंद्रीय कार्यकारिणी सदस्य डॉ. कमल नयन सिंह ने गुरुजी को याद करते हुए कहा, "गुरुजी का जाना मेरे लिए पिता तुल्य छाया के खो जाने जैसा है।" उन्होंने बताया कि कैसे गुरुजी ने अपने जीवन के सबसे कठिन समय में भी हिम्मत नहीं हारी। जब उनके पिता की हत्या कर दी गई थी, तब उन्होंने न केवल अपने परिवार को संभाला बल्कि उस शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन भी खड़ा किया। उन्होंने सूदखोर महाजनों के खिलाफ चरणबद्ध ढंग से उलगुलान की शुरुआत की।
उन्होंने याद किया कि जब गुरुजी पर रेड वारंट था, तब वह जंगल के रास्तों से होते हुए चुपचाप हजारीबाग पहुंचते थे। यहां वह वकीलों से मिलते, अपने केस की स्थिति पर चर्चा करते। उन दिनों उनके पास ज़्यादा कुछ नहीं होता बस सत्तू और चूड़ा साथ लेकर चलते, वही खाकर दिन गुजारते। भावुक होते हुए डॉ. कमल नयन सिंह ने बताया, "2013 में जब मेरे पिता का निधन हुआ था, तब गुरुजी खुद हमारे घर आए थे। हजारीबाग जब भी आते, कभी सर्किट हाउस में नहीं रुकते, हमेशा हमारे घर ही ठहरते थे।"
उन्होंने बताया कि मां के हाथों का बना खाना गुरुजी को बहुत पसंद था। लौकी की सब्ज़ी और रोटी खासकर उनकी पसंदीदा थी। हर दिन एक गिलास दूध पीना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। सबसे भावुक क्षण तब आया जब उन्होंने कहा कि गुरुजी और उनकी मां के बीच एक खास रिश्ता था। वो घंटों बातें किया करते। अगर किसी दिन मां टीवी पर गुरुजी से जुड़ी कोई खबर सुन लेतीं और गुरुजी घर से निकलते, तो प्यार से उन्हें डांट भी देती थीं।
डॉ. कमल नयन सिंह ने आगे बतायाकि हाल के वर्षों तक जब भी वह गुरुजी से मिलने जाते, तो गुरुजी सबसे पहले हजारीबाग की बात करते थे। वे उन वकीलों के परिवार का हालचाल भी पूछते जिनका संघर्ष के दिनों में साथ मिला था। अंत में उन्होंने बेहद भावुक होकर कहा,"आज बहुत दुख की घड़ी है। गुरुजी सिर्फ नेता नहीं थे, वह झारखंड की आत्मा थे संघर्ष, सादगी और संवेदना के प्रतीक।"झारखंड की यह मिट्टी उन्हें हमेशा याद रखेगी। विनम्र श्रद्धांजलि दिशोम गुरु को।"
