द फॉलोअप डेस्क
कांग्रेस की पूर्व विधायक अंबा प्रसाद ने राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार को एक ज्ञापन सौंपा है। उसमें उन्होंने कहा है कि आपके माध्यम से वह मुख्यमंत्री (जो गृह मंत्री भी हैं), झारखंड के समस्त निवासियों, देशवासियों एवं उच्चतम न्यायालय तथा झारखंड उच्च न्यायालय के संज्ञान में एक अत्यंत गंभीर विषय लाना चाहती हूँ। हमारे पुलिस थानों में आए दिन हजारों FIR दर्ज हो रही हैं, जिन पर अब भी 'CrPC की धारा 154' अंकित है। यदि आप इन FIR की तिथियों को देखेंगे, तो आपको आश्चर्य होगा—ये कोई पुराने मामले नहीं हैं, बल्कि कल और परसों की तारीख में दर्ज की गई बिलकुल ताज़ा FIR हैं। मैं आज यह प्रेस कॉन्फ्रेंस इसीलिए कर रही हूँ ताकि इस बड़ी विसंगति को उजागर कर सकूँ।
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जैसा कि आप सभी जानते हैं कि 1 जुलाई 2024 से भारत में 'दंड प्रक्रिया संहिता' (CrPC) के स्थान पर 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता' (BNSS) प्रभावी हो चुकी है। आज 2026 है और इस ऐतिहासिक बदलाव को हुए लगभग डेढ़ साल बीत चुके हैं। इसके बावजूद, झारखंड में NCRB के फॉर्म पर जो ऑनलाइन FIR दर्ज की जा रही है, उसमें अभी भी 'धारा 154 CrPC' का ही उल्लेख किया जा रहा है, जबकि कानूनी रूप से इसे 'धारा 173 BNSS' के तहत दर्ज किया जाना अनिवार्य है।
पूरे राज्य में एक 'मृत कानून' को आधिकारिक सरकारी दस्तावेजों में अभी तक चलाया जा रहा है और विडंबना यह है कि प्रशासन से लेकर विपक्ष तक, सब चुप हैं। यह झारखंड की पुलिसिंग और कानून व्यवस्था की वर्तमान स्थिति पर बड़ा सवालिया निशान है। यह कैसा प्रशासन है और कैसा अभियोजन सेल (Prosecution Cell)? यहाँ तक कि विधानसभा में भी इस विषय को संज्ञान में नहीं लिया गया। यह हमारे राजनीतिक नेतृत्व की कानूनी समझ और संवेदनशीलता पर भी प्रश्न उठाता है, जबकि वे स्वयं कानून के प्रणेता होते हैं।
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मैं यह मुद्दा आज इसलिए उठा रही हूँ क्योंकि आज झारखंड न्यायिक अकादमी में एक राष्ट्रीय स्तर के कानूनी सम्मेलन की शुरुआत हुई है। हमारे राज्य में नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (NUSRL) और कई विधि महाविद्यालय हैं, जहाँ भविष्य के वकीलों और जजों को आज भी इन्हीं गलत फॉर्मों के आधार पर FIR की प्रक्रिया समझाई जा रही है। यह कानूनी प्रक्रिया का मखौल है जिसे तुरंत सुधारने की आवश्यकता है।
